शिक्षा का अधिकार अधिनियम (आरटीई) बनाया तो इसलिए गया था कि गरीबों के बच्चे भी महंगे पब्लिक स्कूलों में पढ़ सकें, लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है।
जहां गरीबों के बच्चे दाखिले के लिए भटक रहे हैं वहीं पैसे एवं पहुंच वालों के बच्चे गरीबों की जगह पढ़ रहे हैं। ऐसा हो रहा है शिक्षा विभाग की नाक के नीचे। यह देख-सुनकर आश्चर्य होगा कि आरटीई के तहत पढ़ने वाले कई बच्चे स्कूल कार से आते-जाते हैं।
उनके माता-पिता अलीशान घरों में रहते हैं और उनकी मासिक आमदनी हजारों में है। अमर उजाला ने ऐसे ही कुछ नाम एवं पतों के लिए कई मोहल्लों में पड़ताल की तो चौंकाने वाली बातें सामने आई।
Case 1 - नाम : संजय कुमार, पेशा : एक प्राइवेट कंपनी में जॉब, पत्नी का पेशा : बिहारीगढ़ के पास एक सरकारी स्कूल में शिक्षिका, पता : संजय कॉलोनी, पटेलनगर। मकान किराए का, लेकिन आलीशान मकान में किराया भी कम से कम पांच हजार रुपए।
यानी सालाना 60 हजार रुपए जो कि आरटीई के वार्षिक आय के 55000 हजार रुपए के क्राइटेरिया से ऊपर है। हैसियत बहुत अच्छी। संजय कुमार का बेटा आरटीई के तहत दाखिले के बाद इन दिनों ब्राइटलैंड स्कूल में पढ़ रहा है। इस संबंध में संजय से सवाल पूछा गया तो वह सकपका गए, लेकिन इस बात का जवाब नहीं दे पाए कि गरीबों के बच्चों के लिए आरक्षित सीट पर उनके बेटे को दाखिला कैसे मिल गया?
Case 2 - नाम : संजय पॉल, पेशा : प्राइवेट लैब में नौकरी, पता : लोवर राजीव नगर। घर : अपना और बढ़िया बना हुआ। हैसियत समाज के मध्यम वर्ग की। संजय पॉल का बेटा आरटीई के तहत सन वैली स्कूल में पढ़ रहा है।
अमर उजाला संवाददाता इनके घर पहुंचा तो बच्चा घर के बाहर साइकिल चलाता मिल गया। उसने सनवैली में पढ़ने की पुष्टि की। संजय की हैसियत और मोहल्ले वालों से मिले फीडबैक के आधार पर यह कहीं से भी साबित नहीं हो रहा है कि वह गरीब व अपवंचित वर्ग के हैं।
Case 3 - नाम : केवल किशोर, पेशा : कुकिंग का। पता : ओल्ड डालनवाला। हैसियत सामान्य परिवार जैसी। केवल किशोर की बेटी आरटीई के तहत ब्राइटलैंड स्कूल में पढ़ रही है।
मोहल्ले के लोगों से बात की गई तो पता चला कि उनकी हैसियत मध्यम वर्ग की है। वह गरीब एवं अपवंचित वर्ग में नहीं आते। बावजूद इसके उन्होंने बेटी का दाखिला आरटीई के तहत शहर के नामी स्कूल में कराया है। हमारी टीम यहां पहुंची तो मोहल्ले के लोगों ने इसकी पुष्टि की।