सोचा था बेटी अच्छे स्कूल में पढ़ेगी-लिखेगी, कुछ कर दिखाएगी। शिक्षा का अधिकार अधिनियम के बारे में सुना तो उम्मीदें और बढ़ गईं। यह सपना कई अन्य माता-पिता की तरह ही विदुशी के पिता मोहन सिंह नेगी ने भी देखा था।
वे उसे पूरा करने की कोशिशों में जुटे ही थे कि एक निजी स्कूल ने यह कहकर उनकी बेटी को दाखिला देने से मना कर दिया कि उनकी बेटी अभी छोटी है। वह सुबह स्कूल के लिए नहीं उठ पाएगी। यह सुन नेगी भौच्चके रह गए।
तेग बहादुर रोड आराघर निवासी मोहन सिंह नेगी ने शिक्षा के अधिकार (आरटीई) के तहत अपनी तीन साल चार माह की पुत्री विदुशी के दाखिले के लिए बीती अप्रैल में नगर शिक्षा अधिकारी कार्यालय में आवेदन किया था। आवेदन के बाद शिक्षा विभाग की ओर से उनकी पुत्री का चयन किया गया, लेकिन निजी स्कूल ने बच्ची को दाखिला नहीं दिया।
मोहन सिंह नेगी स्कूल की ओर से किए गए ‘मजाक’ से न केवल आहत हुए बल्कि यह सोचने पर भी मजबूर हो गए कि आखिर स्कूल ने ऐसा बहाना क्यों बनाया? नेगी इसके बाद से लगातार बेटी के दाखिले के लिए नगर शिक्षा अधिकारी कार्यालय के साथ ही शिक्षा निदेशालय और डीएम कार्यालय के चक्कर लगा रहे हैं, इसके बावजूद न तो उनकी बेटी का दाखिला ही हो पाया है और न उन्हें स्कूल के दिए जवाब का सही मतलब कोई विभागीय अधिकारी ही समझा पाया है।
पहले करते थे मजदूरी, अब स्टांप बेचने का काम
बच्ची के पिता मोहन सिंह मजदूरी करते थे। मोहन की मासिक आय दो हजार रुपये है। अब मोहन कोर्ट में स्टांप बेचने का काम कर रहा है।
बच्ची के दाखिले के लिए सभी आवश्यक प्रमाण पत्र पूरे एवं सही हैं। बच्ची निजी स्कूल में कुछ प्रश्नों का जवाब नहीं दे पाई। वह अपना नाम तक नहीं बता पाई, ऐसे में स्कूल ने उसे दाखिला देने से इनकार कर दिया।
तृप्ता शर्मा, आरटीई प्रभारी
आरटीई के तहत सभी प्रमाण पत्र पूरे होने के बावजूद यदि विद्यालय दाखिला नहीं दे रहा है तो संबंधित सीईओ विद्यालय के खिलाफ कार्रवाई कर सकता है।
सुनील दत्त भट्ट, समन्वयक आरटीई
प्रकरण की जांच करवाऊंगा। कोई दोषी पाया गया तो उसके खिलाफ निश्चित रूप से कार्रवाई की जाएगी।
एसपी खाली, मुख्य शिक्षा अधिकारी देहरादून
25 फीसदी सीटें होती हैं आरक्षित
आरटीई में स्कूल जिले के मुख्य शिक्षा अधिकारी को मान्यता के लिए स्वघोषणा पत्र भरकर देते हैं। इसमें वे यह घोषणा करते हैं कि उनके स्कूल की प्रारंभिक कक्षा में कितनी सीटें हैं। इस सीट के 25 फीसदी सीटें आरटीई के लिए आरक्षित रखी जाती हैं।
ऐसे बच्चे हैं पात्र
शिक्षा के अधिकार के तहत निजी स्कूलों में ऐसे अभिभावक जिनकी वार्षिक आय 55 हजार रुपए या उससे कम है, बच्चों का प्रवेश करा सकते हैं। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, पिछड़ा वर्ग, अनाथ बच्चे, शारीरिक रूप से विकलांग, विधवा और तलाकशुदा माता पर आश्रित बच्चे भी प्रवेश पाने के हकदार हैं।