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इन कॉलेज प्रिंसिपल्स का दर्द कौन सुने

Fri, 07 Feb 2014 08:33 AM IST
सचिन त्रिपाठी/अमर उजाला, लखनऊ
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‘कॉलेज के हर काम के लिए लविवि आकर गिड़गिड़ाना पड़ता है किसी काम के लिए आओ तो विवि का कर्मचारी ऐसे देखता है, मानो कॉलेज नहीं खोला हो, चोर, डाकू, बेईमान हो गए हैं।’
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नर्वदेश्वर लॉ कॉलेज, नर्वदेश्वर मैनेजमेंट और नर्वदेश्वर डिग्री कॉलेज के मैनेजर डॉ. एनएम त्रिपाठी ने जब यह बात कॉलेज डवलपमेंट काउंसिल की बैठक में कही, तो एक को तो मानो सन्नाटा छा गया हो।

विश्वविद्यालय में कॉलेजों की फाइलें लटकी रहने की बात पर हॉल में बैठे कॉलेज प्रिंसिपल्स का भी दर्द जाग उठा। सभी प्रिंसिपल्स और प्रबंधकों ने ताली बजाकर उनकी बात का समर्थन किया।
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मौका था लखनऊ विश्वविद्यालय और कॉलेजों को एक मंच पर लाने की योजना कॉलेज डवलपमेंट काउंसिल की बैठक का। कहने तो यहां विवि और कॉलेजों के आपसी तालमेल से समस्याओं का समाधान के लिए बातचीत करनी थी।

लेकिन पूरी बैठक में शिकवों और शिकायतों का दौर चलता रहा। हालांकि कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं पर बातचीत भी हुई। पिछली बैठकों के मुकाबले इस बार करीब 70 प्रतिशत कॉलेजों ने सीडीसी की बैठक में भाग लिया।

गुरुवार को लविवि के मालवीय सभागार में कॉलेज डवलपमेंट काउंसिल की बैठक हुई, जिसका मकसद लविवि और कॉलेजों को एक मंच पर लाना था।

ताकि बातचीत और साझा प्रयासों के जरिए बहुत सी समस्याओं का समाधान निकाल लिया जाए लेकिन बैठक में विवि ने कॉलेजों की गलतियां गिनाईं तो वहीं कॉलेजों ने भी कामों में विवि की दखलअंदाजी और काम अटकाने पर विवि की खिंचाई की।

विवि के प्रति कुलपति और सीडीसी के अध्यक्ष प्रो. एके सेन गुप्ता ने कॉलेजों को सीडीसी के उद्देश्यों के बारे में बताया। उन्होंने समस्याओं के समाधान करने के लिए कॉलेजों की हरसंभव मदद करने की बात कही।

इसके बाद शैक्षिक गुणवत्ता की बात आई तो प्रो. सेन गुप्ता कॉलेजों की खिंचाई करने से नहीं चूके। उन्होंने कहा कि वित्तविहीन कॉलेजों में शिक्षकों की शैक्षिक अर्हता और उनकी भर्ती प्रक्रिया पर तमाम शिकायतें आती हैं।

कई बार देखा जाता है कि कॉलेज में जिस शिक्षक का अनुमोदन होता है वह वहां पढ़ा ही नहीं रहा होता है। कई बार अनुमोदन होते ही शिक्षक कॉलेज छोड़कर चला जाता है।

यूजीसी की ओर से निर्धारित रकम से कम वेतन देना भी इसका एक प्रमुख कारण है। इसलिए इसमें सुधार होना चाहिए।

बैठक में चर्चाओं का दौर चल ही रहा था कि नर्वदेश्वर लॉ कॉलेज, नर्वदेश्वर मैनेजमेंट और नर्वदेश्वर डिग्री कॉलेज के मैनेजर डॉ. एनएम त्रिपाठी ने कॉलेजों के कामों में विवि के ज्यादा दखल पर आपत्ति जताई।

उन्होंने कहा कि अगर नया विभाग खोलना हो तो उसकी फाइल बढ़ने का नाम ही नहीं लेती है। उन्होंने अपने कॉलेज का उदाहरण देते हुए कहा कि नए विभाग के लिए 19 जुलाई, 2013 को आवेदन किया था।

लेकिन अब तक लविवि में फाइल आगे नहीं बढ़ी है। डॉ. त्रिपाठी ने विश्वविद्यालय की ओर से एलएलबी परीक्षा फीस के लिए 3000 रुपये पर भी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि किसी विश्वविद्यालय में इतनी फीस नहीं ली जाती।

यहां पर इतने अमीर छात्र नहीं है, जो इतनी फीस आसानी से भर पाएं। साथ ही महिला पीजी कॉलेज के प्रबंधक प्रो. एके श्रीवास्तव समेत कई कॉलेजों की ओर से समस्याएं रखीं गईं।
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कहा कि हर काम के लिए प्रिसिंपल्स को विवि आना पड़ता है। कॉलेजों में पीएचडी नहीं शुरू की जा रही है।
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