आईआईटी में दाखिले की खातिर बच्चों की जिंदगी नीरस होती जा रही है। लक्ष्य पर ऐसी निगाह रहती है कि मनोरंजन और खेल के लिए इनके पास समय ही नहीं बचता। दाखिले की खातिर खेल का समय भी पढ़ाई में ही लगा रहे हैं।
आईआईटी की एक्सपर्ट कमेटी ने बच्चों के इस ‘ऑल वर्क, नो प्ले’ फार्मूले पर गहरी चिंता जताई है। अब एचआरडी मंत्रालय ने इस पर देशभर से फीडबैक मांगा है।
आईआईटी में दाखिले के लिए प्रतिस्पर्धा बहुत कठिन है। पहले जेईई मेंस परीक्षा पास करनी होती है। इसके बाद केवल शीर्ष दो लाख छात्रों को ही जेईई एडवांस परीक्षा में बैठने का मौका मिलता है। चुनौती यहीं खत्म नहीं होती। आईआईटी में दाखिले के लिए बच्चे का 12वीं में कम से कम 75 प्रतिशत अंक या टॉप 20 परसेंटाइल में होना जरूरी होता है।
इतने दबाव में बच्चा सफलता के लिए कोचिंग क्लासेज का रुख कर लेता है। अपेक्षाओं का बोझ बढ़ने से बच्चे खेल से दूर हो गए हैं। आईआईटी काउंसिल की एक्सपर्ट कमेटी की रिपोर्ट में बताया गया है कि बच्चों की लाइफ नीरस हो गई है। यहां तक कहा गया है कि कई पैरेंट्स लोन लेकर बच्चों को कोचिंग कराने लगे हैं।
उन्हें लगता है कि इतनी कठिन परीक्षाओं में कोचिंग से ही पार पाया जा सकता है। कमेटी ने इसके लिए वर्ष 2017 से आईआईटी दाखिले के पैटर्न में एप्टीट्यूड टेस्ट सहित कई बदलावों की सिफारिश की है, ताकि कोचिंग पर निर्भरता धीरे-धीरे खत्म हो जाए।
मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने देशभर के शिक्षकों, विशेषज्ञों, अभिभावकों और छात्रों से फीडबैक मांगा है। शिक्षा विशेषज्ञ प्रो. वीए बौड़ाई के मुताबिक निश्चित तौर पर कठिन मुकाबले की वजह से ही बच्चों पर पढ़ाई का बोझ बढ़ गया है। इसे हल्का करने की सख्त जरूरत है।