राज्य सरकार हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय (एचपीयू) को पैसा देने से पलट गई है। दरअसल, बीते मई में यूजी परीक्षाओं के मूल्यांकन का शिक्षकों ने बहिष्कार कर दिया। शिक्षक अड़ गए कि पहले परीक्षा ड्यूटी और मूल्यांकन की बकाया राशि का भुगतान किया जाए, तभी वे मूल्यांकन करेंगे।
इस पर खासा बवाल हुआ। अंतत: बवाल को शांत करने और मूल्यांकन शुरू करवाने के लिए शिक्षा सचिव और कुल सचिव की बैठक हुई। तय हुआ कि फिलहाल एचपीयू अपने खाते से शिक्षकों को भुगतान कर दे। बाद में इस राशि को सरकार लौटा देगी।
बाकायदा लिखित में समझौता हुआ। इस पर एचपीयू ने सवा सात करोड़ रुपये खर्च दिए। अब सरकार ने एचपीयू को पत्र जारी कर इस राशि के भुगतान से साफ मना कर दिया है। अन्य देनदारियों के भुगतान लिए मांगी गई 56 करोड़ ग्रांट के प्रस्ताव को भी खारिज कर दिया।
एचपीयू की हालत ये है कि अब तक रूसा प्रथम सत्र की उत्तर पुस्तिकाओं और मूल्यांकन के मानदेय का भुगतान भी नहीं किया गया है। ऐसे में पहले से आर्थिक संकट से जूझ रहे एचपीयू को सरकार से ग्रांट न मिली तो अक्तूबर में कर्मचारियों को वेतन तक देना मुश्किल हो जाएगा।
सरकार जल्द जारी करे ग्रांटः झारटा
कुल सचिव प्रो. मोहन झारटा ने माना कि मई में सरकार ने राशि देने की बात कही थी। इसी आधार पर विवि ने आर्थिक संकट के बावजूद शिक्षकों की देनदारी का भुगतान किया। उन्होंने सरकार से आग्रह किया है कि सात करोड़ से अधिक की इस राशि को जल्द विवि को जारी किया जाए।
कैसे चुकाएंगे अब करोड़ों रुपये की देनदारी
विवि की कार्यकारी परिषद के सदस्य चौधरी वरयाम सिंह बैंस और कोर्ट सदस्य तेज राम ने कहा कि अतिरिक्त ग्रांट के बिना 56 करोड़ से अधिक की देनदारियों का भुगतान संभव नहीं। मूल्यांकन के लिए सात करोड़ की राशि के साथ पेंशन, ग्रेच्युटी, 2013 के बकाया डीए एरियर, लीव एनकैशमेंट की देनदारियों के भुगतान के लिए सरकार को 56 करोड़ की ग्रांट जारी करनी चाहिए।