उत्तराखंड शिक्षा विभाग अगर उस शासनादेश का सही तरीके से पालन कर ले, जो प्रदेश में मान्यता प्राप्त निजी स्कूलों पर लागू है तो कहीं मनमानी की शिकायत सामने न आए।
सूचना का अधिकार के तहत मिले उत्तर प्रदेश के दौर से लागू इस शासनादेश में साफ है कि निजी स्कूल तीन साल तक शुल्क नहीं बढ़ा सकते। इसी तरह गैरवाजिब शुल्क लेना प्रतिबंधित है तो स्कूल प्रास्पेक्टस में हर वाजिब शुल्क का विवरण देना अनिवार्य है।
लेकिन, न स्कूल प्रबंधन इसका पालन करते हैं, न शिक्षा विभाग ही ऐसा करवाने में कामयाब होता है। ऐसे में मनमानी लूट करने वाले निजी स्कूलों पर लगाम के लिए अभिभावकों के पास झंडा बुलंद करने का ही रास्ता बचता है।
जीओ के आधार पर मिलती है मान्यता
प्रदेश में निजी स्कूलों को इसी शासनादेश के आधार पर ही मान्यता दी जाती है। 14 दिसंबर 1995 को उत्तर प्रदेश सरकार ने यह जीओ जारी किया था। अलग गठन के बाद उत्तराखंड में भी यही शासनादेश लागू है।
शासनादेश के खास बिंदु
-शिक्षण शुल्क में तीन साल बाद होने वाली बढ़ोतरी अधिकतम दस प्रतिशत हो सकती है
-शुल्क में वृद्धि से पूर्व स्कूल प्रबंधन को पैरेंट्स टीचर एसोसिएशन (पीटीए) से अनिवार्य रूप से अनुमति लेनी होगी
-अभिभावकों से बच्चों के पंजीकरण और स्कूल भवन के नाम पर शुल्क नहीं वसूला जा सकता है
शासनादेश में ये मद स्वीकृत
-शिक्षण शुल्क
-महंगाई शुल्क
-विकास शुल्क
-बिजली, पानी आदि
-पुस्तकालय एवं वाचनालय
-विज्ञान शुल्क
-श्रव्य दृश्य शुल्क
-क्रीड़ा शुल्क
-परीक्षा/ मूल्यांकन शुल्क
-विद्यालय समारोह/ उत्सव शुल्क
-विशेष विषयों (कंप्यूटर, संगीत आदि) की शिक्षा का शुल्क