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ये सरकारी स्कूल दे रहे बदहाली की 'मिसाल'

Thu, 22 Jan 2015 01:23 PM IST
ब्यूरो / अमर उजाला, देहरादून
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उत्तराखंड के सरकारी स्कूलों की हालत पूरे देश में बदहाली की मिसाल दे रही है। सरकारी स्कूलों की दुर्दशा जानने के लिए किसी दुर्गम इलाके में जाने की जरूरत नहीं है। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री के आवास से महज तीन किलोमीटर दूर स्थित दो स्कूलों की हालत पूरी कहानी बया कर देती है।
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शिक्षकों की कमी के कारण प्रदेश के कई स्कूलों पर ताला लग चुका है, लेकिन यहां एक स्कूल में 16 बच्चों के लिए तीन शिक्षक तैनात हैं। दूसरा सरकारी स्कूलों की बदहाली की मिसाल है। यहां बच्चे खुले आसमान के नीचे बैठकर पढ़ते हैं।

बुधवार दोपहर अमर उजाला टीम प्राथमिक विद्यालय गल्जवाडी पहुंची तो वहां आठ बच्चों को एक महिला पढ़ा रही थी। हमने इसे शिक्षिका समझा, लेकिन पूछा तो पता चला कि वह स्कूल में तैनात शिक्षक की पत्नी है।
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बातों बातों में पता चला कि स्कूल में तैनात दो शिक्षक शिव कुमार तोमर और खेमकरण क्षेत्री कार्यालय के काम से कहीं गए हुए थे, जबकि तीसरी शिक्षिका लता असवाल का अता पता नहीं था। कुछ देर बाद लता लौटीं तो अमर उजाला टीम को देखकर हड़बड़ा गईं। उन्होंने बताया कि स्कूल में 16 बच्चे हैं, लेकिन आज आठ ही स्कूल पहुंचे।

इसके बाद हम पहुंचे पास ही स्थित प्राथमिक विद्यालय इंदिरा नगर। इस स्कूल के लिए नया भवन करीब तीन साल पहले स्वीकृत हुआ था। काम भी शुरू हुआ, लेकिन बजट की कमी आड़े आ गई। जबकि, पुराना भवन पहले ही तोड़ा जा चुका है।

ऐसे में बच्चे खुले आसमान के नीचे बैठकर पढ़ते हैं। मौसम खराब होने पर बच्चों को संकुल केंद्र के एक कमरे में बैठा दिया जाता है। इस स्कूल में 28 बच्चों पर दो शिक्षक तैनात हैं।

छात्रों के अनुपात में शिक्षकों की नियुक्ति की जाएगी, प्रदेश के ऐसे समस्त स्कूलों से जहां बच्चे कम और शिक्षक अधिक हैं आगामी शिक्षा सत्र से उन शिक्षकों को हटाकर उन्हें दूसरे विद्यालयों में भेजा जाएगा।
- सीमा जौनसारी, शिक्षा निदेशक

न स्कूलों में शिक्षक न जरूरी सुविधाएं

उत्तराखंड में लाख सरकारी दावों के बावजूद प्राथमिक शिक्षा बैसाखियों के सहारे चल रही है। हालत यह है कि वर्ष 2010 में लागू हुए शिक्षा का अधिकार अधिनियम के तहत आज भी स्कूलों में मानक पूरे नहीं हो पाए हैं। प्रथम संस्था की असर (एनुअल स्टेटस आफ एजूकेशन रिपोर्ट) में सरकारी दावों की पोल खुलकर सामने आई है।

रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश में सिर्फ 24.6 प्रतिशत स्कूल ही छात्र-शिक्षक अनुपात को पूरा करते हैं, जबकि 75.4 प्रतिशत स्कूलों में यह अनुपात पूरा ही नहीं होता। राज्य गठन के 14 साल बाद भी उत्तराखंड में 31.9 प्रतिशत स्कूलों के बच्चों को मैदान मयस्सर नहीं है, जबकि 43.4 प्रतिशत स्कूलों में चहारदीवारी तक नहीं बनी है।

17.7 प्रतिशत स्कूल ऐसे हैं जहां पेयजल की कोई सुविधा नहीं है। 13 प्रतिशत स्कूल ऐसे हैं जहां सुविधा है लेकिन पेयजल उपलब्ध नहीं है। पांच प्रतिशत स्कूल ऐसे पाए गए जहां शौचालय की सुविधा ही नहीं है, 25.8 प्रतिशत स्कूल ऐसे हैं जहां सुविधा तो है लेकिन शौचालय प्रयोग योग्य नहीं हैं।

26.2 प्रतिशत स्कूल ऐसे सामने आए जहां लड़कियों के लिए शौचालय नहीं है जबकि 8.8 प्रतिशत ऐसे हैं जहां सुविधा है लेकिन ताला लटका हुआ पाया गया। 11.3 प्रतिशत स्कूल ऐसे हैं जहां लड़कियों के शौचालय की सुविधा हे लेकिन उपयोग लाने योग्य नहीं है।

14.1 प्रतिशत स्कूलों में पुस्तकालय नहीं है हालांकि मिड डे मील के लिए 97.3 प्रतिशत स्कूलों में रसोई पाई गई जो कि एक अच्छा संकेत भी है। गौरतलब है कि केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय के साथ काम करने वाली प्रथम संस्था ने 13 जनवरी को नई दिल्ली में पूरे देश की शिक्षा सर्वेक्षण रिपोर्ट जारी की है। इसमें उत्तराखंड का सर्वे भी शामिल है।

नई टिहरी में 38, पौड़ी में 18 प्राइमरी स्कूल बंद

नई टिहरी और पौड़ी में सरकारी स्कूलों में लगातार ताले लगते जा रहे हैं। छात्रों की संख्या दिन-प्रतिदिन घटती जा रही है। टिहरी के 38 और पौड़ी के 18 स्कूल इसी शिक्षा सत्र में बंद हो चुके हैं। टिहरी में 273 प्राथमिक स्कूलों में भी छात्र संख्या 10 से कम होने के चलते बंद होने की तलवार लटक रही है।

पौड़ी में शून्य छात्र संख्या वाले सरकारी प्राइमरी स्कूलों की संख्या बढ़कर 229 हो गई है। टिहरी जिले में 1473 प्राथमिक स्कूल संचालित किए जा रहे थे, लेकिन इस शिक्षा सत्र में देवप्रयाग छह, थौलधार पांच, भिलंगना तीन, प्रतापनगर छह, नरेंद्रनगर तीन, कीर्तिनगर, जाखणीधार सात-सात और चंबा ब्लाक का एक प्राथमिक स्कूल शून्य छात्र संख्या के कारण बंद हो चुके हैं।

छात्र संख्या के घटने के पीछे गांव से हो रहा पलायन, प्राइवेट स्कूलों की बढ़ती संख्या, सरकारी स्कूलों में शिक्षा का गिरता स्तर और राजनीतिक दबाव में बिना किसी प्लानिंग के स्कूल खोलना माना जा रहा है।

तमाम सुविधाओं के बाद भी छात्र संख्या का घटना चिंता का विषय है। 10 से कम छात्र संख्या वाले 273 स्कूलों के संबंध में 27 जनवरी को शासन स्तर पर निर्णय लिया जाना है। इसके बाद ही आगे की कार्रवाई होगी।
- एसपी सेमवाल, जिला शिक्षा अधिकारी (बेसिक)
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पौड़ी में अब तक बंद हो चुके 73 स्कूल

पौड़ी जिले में इसी शिक्षा सत्र में 18 स्कूल बंद हो चुके हैं। यह खुलासा शिक्षा विभाग की रिपोर्ट से हुआ है। जिले में छात्र संख्या शून्य होने से 73 स्कूल अब तक बंद हो चुके हैं। 479 विद्यालयों में छात्र संख्या दस या इससे कम रह गई है। इनमें 152 स्कूलों में तो विद्यार्थियों की संख्या एक से पांच तक ही है।

चौंकाने वाली बात यह है कि जिले में 229 स्कूलों में कक्षा एक में एक भी विद्यार्थी नहीं है। जिले पहली कक्षा में शून्य छात्र संख्या वाले सर्वाधिक 30 प्राइमरी स्कूल एकेश्वर में हैं।

इसके अलावा पौड़ी में नौ, खिर्सू और नैनीडांडा में 11-11,पाबौ, दुगड्डा और थलीसैण में 10-10, कोट में 24, कल्जीखाल में 29, पोखड़ा में 12, यमेश्वर में 18, रिखणीखाल में आठ, बीरोंखाल में 14, जयहरीखाल में 15 और द्वारीखाल में 19 स्कूलों में कक्षा एक में एक भी विद्यार्थी नहीं है।

सरकारी प्राइमरी स्कूलों में छात्र संख्या का तेजी से घटना चिंता का विषय है। इस पर चिंतन की जरूरत है। इस दिशा में प्रयास भी किया जा रहा है। प्राइवेट स्कूलों की तरफ अभिभावकों का बढ़ते रुझान और पलायन समेत कई कारण हैं।
- केएस रावत जिला शिक्षा अधिकारी बेसिक पौड़ी

सरकारी प्राइमरी स्कूलों की तरफ विद्यार्थियों का रुझान बढ़ाने के लिए शिक्षा को राजनीति से दूर रखना होगा। व्यवस्थाओं को सुधारने के साथ-साथ शिक्षकों को समर्पित होकर कार्य करना होगा।
- सुरेंद्र सिंह नेगी, सेवानिवृत्त प्रधानाध्यापक

स्कूलों की संख्या - कक्षा - छात्र संख्या
233 - दो - शून्य
190 - तीन - शून्य
55 - चार - शून्य
22 - पांच - शून्य
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