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फीस वसूलने में स्मार्ट पर पढ़ाई में फिसड्डी हुए स्कूल

Sat, 05 Jul 2014 03:08 AM IST
सचिन त्रिपाठी/अमर उजाला, लखनऊ
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जानकीपुरम में एक मिशनरी स्कूल में कंप्यूटर, एक्टिविटी टीचिंग आदि के मद में फीस वसूली जाती है। क्लास में टीचर कंप्यूटर की थ्योरी रटा देती हैं।
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हफ्ते में एक दिन पांच कंप्यूटर के सहारे पूरे स्कूल को कंप्यूटर का प्रैक्टिकल कराने का दावा किया जाता है। एक्टिविटी के नाम पर भी बच्चे को कुछ नहीं कराया जाता।

आलमबाग निवासी नीरज और अंकिता शर्मा बीते साल तक अपने बच्चे को स्कूल में दाखिला दिलाने से पहले रोजाना एक घंटे घर पर पढ़ाते थे।

एडमिशन दिलाने के बाद से बच्चे को होमवर्क कराने में दोनों को अब दो घंटे का समय देना पड़ता है। बच्चा साधारण से साधारण सवाल भी घर पर ही पूछता है।

शहर के चुनिंदा बड़े और महंगे स्कूलों की देखा-देखी लगभग सारे निजी स्कूल फीस वसूली के मामले में स्मार्ट हो गए हैं। बात पढ़ाई के पैटर्न आती है तो ज्यादातर स्कूलों में पुराना राग ही अलापा जा रहा है।
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स्मार्ट क्लास रूम की बात हो या एक्टिविटी बेस टीचिंग की, शहर के 90 फीसदी से ज्यादा स्कूल इनसे वाकिफ ही नहीं है।

स्कूलों में बच्चे को होमवर्क देकर टीचर छुटकारा पा लेते हैं और पढ़ाई का बोझ एक बार फिर से अभिभावकों पर आ जाता है।

पढ़ाई के पैटर्न में स्कूलों में कोई कंपटीशन देखने को नहीं मिलता पर फीस वसूली के मामले में सभी एक दूसरे से आगे निकलने की होड़ दिखाई देते हैं।

निजी स्कूल संचालक हर साल विकास, कंप्यूटर, एक्टिविटी, समर-विंटर कैंप आदि मदों के नाम पर वसूली के नए-नए तरीके ईजाद कर लेते हैं।

पर पढ़ाई के नाम पर अभी भी किताब से देख-देखकर पढ़ाई और बच्चों को रटाने का ढर्रा ही चल रहा है। स्कूलों में तकनीक और एक्टिविटी बेस टीचिंग के नाम पर केवल फीस वसूली हो रही है।

बच्चों को इसका फायदा नहीं मिल पा रहा है। 20 साल पुराने जिस पैटर्न पर पढ़ाई होती थी ज्यादातर स्कूल उसी ढर्रे को अपनाए हुए हैं। एजूकेशन पैटर्न बदलने के नाम पर बच्चों के बस्ते का बोझ बढ़ जाता है।

इसका नतीजा बच्चों पर ज्यादा प्रेशर के रूप में देखने को मिलता है। सीबीएसई और यूपी बोर्ड दोनों बच्चों की क्रियात्मक शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए प्रयास कर रहे हैं।

पर अभी भी निजी स्कूल क्रियात्मक शिक्षा के नाम पर केवल खानापूरी कर रहे हैं। एक्टिविटी बेस टीचिंग के नाम पर निजी स्कूलों ने फीस वसूली भी शुरू कर दी है लेकिन क्लास में क्रियात्मक टीचिंग का अता-पता नहीं है।

सीसीई के नाम पर हो रही नंबर की बंदरबांट
बच्चों को रटने की प्रवृत्ति से बचाने के लिए सीबीएसई और यूपी बोर्ड ने सीसीई (सतत एवं समग्र मूल्यांकन) लागू किया है। स्कूलों की ईमानदारी परखने के लिए सीबीएसई बोर्ड एसेसमेंट कार्य का सत्यापन करवाता है।

वहीं दूसरी ओर यूपी बोर्ड में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है। यूपी बोर्ड में कक्षा 10 में 100 नंबर के हर पेपर में 30 नंबर केवल सीसीई के आधार पर ही दिए जाते हैं।

स्कूलों द्वारा दिए गए नंबरों के आधार का सत्यापन करने की कोई व्यवस्था न होने के कारण खूब मनमानी की जाती है। जानकारों के अनुसार बहुत से निजी स्कूलों में बिना किसी प्रोजेक्ट वर्क के पैसे लेकर 30 में से 30 नंबर बांटे जाते हैं।

कुछ स्कूलों ने किया सराहनीय कार्य
निजी स्कूलों का एक वर्ग ऐसा भी है जो क्लास में पढ़ाने के नए तरीकों से पढ़ाई करवा रहे हैं। दि लखनऊ पब्लिक कॉलेेजिएट भी इनमें से एक है।

स्कूल के सह निदेशक डॉ. जावेद आलम के जमाना बदल रहा है। नए माहौल में नए ढंग से पढ़ाई हो रही है। इसलिए हमें पढ़ाई के नए तरीके भी इजाद करने होंगे।

इसीलिए स्कूल की दोनों शाखाओं में क्लासरूम एक्टिविटी के तहत पढ़ाई करवाई जाती है।

क्लासरूम एक्टिविटी में स्टूडेंट्स को न केवल टीचर पढ़ाई गई चीजों के बारे में मुंहजबानी बताते हैं बल्कि एक्टिविटी के माध्यम से उसकी व्याख्या करते हैं।

जैसे- क्लास में गाय के चैप्टर को पढ़ाने के बाद बच्चों को बुलाकर उन्हें गाय जैसे बनकर दिखाया जाता है। इस तरह से बच्चा आसानी से सीखता है।

लखनऊ में जयपुरिया, अवध पब्लिक कॉलेजिएट, आरएलबी, एसकेडी, जीडी गोयनका, सेंट जोजफ, दिल्ली पब्लिक स्कूल, एमिटी इंटरनेशनल सहित कई स्कूलों में नए तरीकों के जरिए बच्चों को पढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है।

सिटी मांटेसरी स्कूल में महंगी फीस के साथ ही बच्चों की पर्सनाल्टी डेवलपमेंट की विशेष कक्षाएं भी चलाई जाती हैं। समय-समय पर होने वाले सेमिनार और इंटरनेशनल कांफ्रेंस से भी बच्चों को काफी कुछ सीखने को मिलता है।
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एजूकेशन टूर के नाम पर भी बच्चो को बाहर भेजा जाता है। इन सबके लिए बाकायदा फीस वसूली जाती है।

सीएमएस और दूसरे निजी स्कूलों की देखा-देखी गली-मोहल्ले के स्कूलों ने भी विभिन्न मदों में फीस की वसूली शुरू कर दी है लेकिन एक्टिविटी बेस टीचिंग के नाम पर कुछ भी नहीं है।
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