नाम बड़े और दर्शन छोटे। जी हां कुछ यही हाल देहरादून में इंजीनियरिंग कॉलजों का भी है। देहरादून के बड़े कॉलेजों ने दावे तो बहुत बड़े-बड़े किए लेकिन इनमें छात्रों का टोटा चल रहा है। छात्रों के अभाव में यह कॉलेज नामभर के ही साबित हो रहे हैं।
एक बार फिर उत्तराखंड के इंजीनियरिंग कालेज सीटों के सूखे की मार झेल रहे हैं। कालेजों में सीटें तो बहुत हैं लेकिन यहां पढ़ने वाला कोई नहीं। हालात यह हैं कि पहली काउंसिलिंग के बाद दस हजार से ज्यादा सीटें खाली रह गई।
उत्तराखंड तकनीकी विवि की ओर से कुल सरकारी और गैर सरकारी संस्थानों में 13201 सीटों के लिए प्रथम चरण की बीटेक काउंसिलिंग शुरू की गई। काउंसिलिंग में करीब 5600 छात्रों ने अपनी फीस जमा की।
करीब 4600 छात्रों को सीट अलॉट की गई लेकिन इनमें से महज तीन हजार छात्रों ने ही दाखिला लिया। दस हजार खाली सीटों के साथ इन दिनों तकनीकी विवि की द्वितीय काउंसिलिंग आयोजित की जा रही है।
कॉलजों में छात्रों का भारी अकाल
दो अगस्त तक चलने वाली काउंसिलिंग में तीन दिनों में महज 400 छात्रों ने ही अपनी फीस जमा कराई है। ऐसे में हालात बेहद चिंताजनक बन रहे हैं। कालेजों में छात्रों का भारी अकाल है।
लगातार गिर रहे इंजीनियरिंग ग्राफ की वजह से पहले ही कई तकनीकी संस्थान नीलामी की हालत में आ गए हैं। द्वितीय चरण की काउंसिलिंग में सोमवार की शाम तक 1687 छात्र अपनी च्वाइस लॉक कर चुके थे।
गत वर्ष भर पाई थी 5500
गत वर्ष प्रथम और द्वितीय चरण की काउंसिलिंग के बाद तृतीय चरण में 12वीं के अंकों के आधार पर सीधे बीटेक में दाखिला दिया गया। बावजूद इसके प्रदेश भर के तकनीकी संस्थानों में महज 5500 सीटें ही भर पाई थी। पांच वर्षों में सूबे में इंजीनियरिंग शिक्षा जबर्दस्त गिरावट के दौर से गुजर रही है।