उत्तराखंड के शिक्षा विभाग के लापरवाही की मार सरकारी स्कूलों के हजारों बाल वैज्ञानिकों पर पड़ रही है। स्थिति है कि केंद्र के इंसपायर अवार्ड के लिए इस बार दून समेत सात जिलों से एक भी छात्र का नाम नहीं भेजा गया है।
पुरस्कार के लिए पांच साल में उत्तराखंड से 11 हजार छात्रों के नाम भेज जाने थे, लेकिन भेजे गए केवल 5250 छात्रों के नाम। सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों में विज्ञान के प्रति रुचि बढ़ाने के लिए केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने 2009-10 में योजना की शुरूआत की थी।
इसमें स्कूल छठी से दसवीं तक के मेधावी बच्चों के नाम मुख्य शिक्षा अधिकारी को भेजते हैं। मुख्य शिक्षा अधिकारी इसे नोडल एजेंसी एससीईआरटी को भेजते हैं, लेकिन वर्ष 2014-15 में बागेश्वर, देहरादून, हरिद्वार, नैनीताल, टिहरी, ऊधमसिंह नगर और उत्तरकाशी जनपद से एक भी बच्चे का नाम नहीं भेजा गया।
प्रदेश भर से इस साल महज 1198 नाम ही भेजे गए हैं। ऐसे में हजारों होनहार छात्र इस पुरस्कार से वंचित हो जाएंगे।
चयनित होने पर मिलते हैं पांच हजार
स्कूलों से छात्रों का नाम तय होने पर उन्हें पांच हजार रुपये की पुरस्कार राशि मिलती है। इसके बाद राष्ट्रीय प्रतियोगिता में मॉडल चयनित होने पर दो लाख रुपये का पुरस्कार मिलता है।
उत्तराखंड में 2010-11 से इस पुरस्कार की शुरुआत हुई थी। विभागीय अधिकारियों के अनुसार 11 हजार का कोटा पांच साल के लिए था। 31 मार्च 2015 को यह मियाद पूरी हो जाएगी।
छात्रवृत्ति के लिए देरी से पहुंचे नाम
राष्ट्रीय साधन सह योग्यता छात्रवृत्ति के लिए भी बच्चों के नाम देरी से भेजे गए हैं। इस छात्रवृत्ति के लिए जनवरी तक नाम केंद्र को पहुंच जाने चाहिए थे, लेकिन जनपदों से ही 15 जनवरी तक 1900 बच्चों के नाम पहुंच पाए हैं।
निदेशक नाराज
शुक्रवार को सीमेट में आयोजित शिक्षा विभाग की समीक्षा बैठक में शिक्षा निदेशक सीमा जौनसारी ने अधिकारियों की इस लापरवाही पर नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि अधिकारी पुरस्कार के लिए बच्चों के नाम तक नहीं भेज पा रहे हैं।