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'केमिकल इंडस्ट्री पर्यावरण के लिए सबसे बड़ा खतरा'

Fri, 06 Dec 2013 12:25 PM IST
अमर उजाला / चंडीगढ़
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एक तरफ डेवलेपमेंट के लिए संसाधनों का बड़े स्तर पर प्रयोग किया जा रहा है तो दूसरी ओर केमिकल इंडस्ट्री से पर्यावरण को खतरा पैदा हो गया है।
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इस थीम पर पंजाब यूनिवर्सिटी के केमिस्ट्री विभाग में देशभर से जुटे वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं ने अपने प्रोजेक्ट पेश किए।

इंडियन केमिकल सोसाइटी की 50वीं सालाना कन्वेंशन में 500 से अधिक देशभर के रिसर्च स्कॉलर और शोधकर्ता नई टेक्नोलॉजी से जीवन पर पड़ने वाले असर और उसके बचाव पर अपने शोध पेश कर रहे हैं।

कन्वेंशन के दूसरे दिन 150 से अधिक डेलीगेट्स ने पोस्टर प्रेजेंटेशन दी। दूसरे दिन की शुरुआत साइंटिस्ट रुचि राम साहनी पर विशेष सेशन से हुई।

अमेरिका की टेक्सेस यूनिवर्सिटी से आई डॉ. निशिमा ने भी नैनो टेक्नोलॉजी के मल्टी फंक्शनल प्रयोग पर लेक्चर दिया। कार्यक्रम में इंडियन केमिकल सोसायटी के पहले प्रेसिडेंट प्रो. बावा करतार सिंह भी मौजूद थे।
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ग्रिन लिक्वेड का बैटरी में बेहतर प्रयोग  
पर्यावरण और एनर्जी को ध्यान में रखते हुए उतरबंग यूनिवर्सिटी, उत्तरी बंगाल से पहुंचे मिलन चंद्रा और अनुराधा सिन्हा ने खास ग्रीन लिक्वेड तैयार किया है।

मिलन ने बताया कि ग्रीन लिक्वेड का प्रयोग बैटरी इंडस्ट्री में किया जाता है। केमिकल को बैटरी के अलावा, फूड, मेडिसिन में भी प्रयोग किया जा सकता है। अनुराधा बताती हैं कि यह काफी इको फ्रेंडली सोलवेंट है। इस प्रोजेक्ट को प्रो. एमएन राव की देखरेख में किया जा रहा है।

इससे बार-बार मिलेगी ऊर्जा   
अमरावती महाराष्ट्र से पहुंचे योगेश व्यवहारे अपने खास पोस्टर के साथ पहुंचे। पीएचडी रिसर्च स्कॉलर योगेश ने बताया कि चीजों का रिसाइकल करना बहुत जरूरी है।

अधिक केमिकल के प्रयोग से जमीन, पानी और हवा को अधिक नुकसान होता है। उन्होंने एफई-एमओ-ओ कैटेलिस्ट तैयार किया है। उन्होने पोस्टर के माध्यम से बताया कि खास केमिकल के प्रयोग से ऊर्जा स्रोत को रिसाइकिल किया जा सकेगा।
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डाई से जल प्रदूषण सबसे अधिक  
आम जिंदगी और इंडस्ट्री सेक्टर में डाई का सबसे अधिक प्रयोग हो रहा है। डाई में काफी हानिकारक केमिकल होते हैं। डाई मिला केमिकल जमीन के अलावा पानी को सबसे अधिक प्रदूषित करता है।

यह पोस्टर यूनिवर्सिटी इंस्टीट्यूट ऑफ केमिकल इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी (यूआईसीईटी) पीयू की शोधकर्ता रीना ने पेश किया।

उन्होंने बताया कि डाई मिले हानिकारक केमिकल को अलग करने के लिए उन्होंने एक्टिव कार्बन का प्रयोग किया है।

इस विधि से एक दिन के भीतर ही डाई मिला पानी पूरी तरह से पीने लायक हो सकता है। अपनी स्टडी में उन्होंने पानी का टेंपरेचर बढ़ाकर इस प्रयोग को किया है।
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