राष्ट्रीय आयोग के एक फैसले ने देशभर के स्टूडेंट्स को बड़ा झटका दिया है। आयोग ने एक शिक्षण संस्थान के खिलाफ हुए फैसले को न केवल खारिज कर दिया बल्कि उक्त मामले को उपभोक्ता अदालत के दायरे से भी बाहर करार दिया।
उक्त शिक्षण संस्थान के खिलाफ मान्यता प्राप्त डिग्री न देने को लेकर मुआवजा देने का फैसला हुआ था। आयोग ने फैसला सुनाते हुए कहा कि शिक्षा कोई वस्तु नहीं है और ये मामला उपभोक्ता अदालत के अधिकार में नहीं आता।
इससे पहले नवीन कुमार चौधरी और पांच अन्य छात्रों ने सेक्टर-32 स्थित रीजनल इंस्टीट्यूट ऑफ को-ऑपरेटिव मैनेजमेंट(आरआईएमटी)के खिलाफ स्टेट कंज्यूमर डिस्प्यूट रेडरेसल कमीशन में अपील की थी।
इंस्टीट्यूट ने दावा किया था कि उनका पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा मास्टर ऑफ बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन(एमबीए) के बराबर है और एसोसिएशन ऑफ इंडियन यूनिवर्सिटीज से मान्यता प्राप्त भी है। इंस्टीट्यूट के इसी दावे पर छात्रों ने दाखिला लिया था। जब उन्हें डिप्लोमा मिला तो उन्हें पता चला कि यह एमबीए की डिग्री के समकक्ष नहीं है।
इसी के चलते छात्रों ने उपभोक्ता अदालत में अपील की। उपभोक्ता अदालत ने भी छात्रों के पक्ष में फैसला सुनाया और इंस्टीट्यूट को प्रति छात्र 4,53,500 रुपये फीस के और सभी को एक-एक लाख रुपये मुआवजा देने के आदेश दिए।
फैसले के खिलाफ इंस्टीट्यूट ने राष्ट्रीय आयोग का दरवाजा खटखटाया। इंस्टीट्यूट के वकील पंकज चादगोठिया ने आयोग के समक्ष कहा कि डिग्री और डिप्लोमा से संबंधित शिकायतें उपभोक्ता संरक्षण कानून के अंतर्गत नहीं आती।
सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए चांदगोठिया ने कहा कि 2010 में महर्षि दयानंद यूनिवर्सिटी के खिलाफ मामले की सुनवाई में कोर्ट ने कहा कि एजुकेश इज नॉट ए कमॉडिटी।
चांदगोठिया की दलील पर राष्ट्रीय आयोग ने इंस्टीट्यूट के पक्ष में फैसला सुनाया और चंडीगढ़ उपभोक्ता अदालत के फैसले को भी रद्द कर दिया।