राजधानी की दो यूनिवर्सिटीज में कम्यूनिटी रेडियो दूर की कौड़ी बनकर रह गया है। लखनऊ विश्वविद्यालय में यह प्रस्ताव पांच वर्षों से लटका है।
तो बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर केन्द्रीय विश्वविद्यालय (बीबीएयू) में भी आठ महीने पहले तैयार किया गया यह प्रस्ताव परवान नहीं चढ़ पाया है। अधिकारियों की उदासीनता से एक अच्छी पहल दम तोड़ रही है।
कभी सरकारी स्तर पर काम में पेंच फंस जाता है तो कभी विश्वविद्यालय के स्तर पर प्रयास ठंडे पड़ जाते हैं। कम्यूनिटी रेडियो को शुरू करने का मकसद वॉयस टू वॉयसलेस था।
यानी ऐसे लोग जिनकी बातें शासन-प्रशासन व आम आदमी तक नहीं पहुंच पाती हैं, उनकी आवाज को इसके माध्यम से मुखर बनाना था। उदाहरण के तौर पर भूख से हो रही मौत पर कोई कार्यक्रम सुनाया जाएगा तो उसमें भूख से पीड़ित लोगों की व्यथा सर्वोपरि होती।
इस कम्यूनिटी रेडियो के माध्यम से छात्र भी समाज की वास्तविक समस्याओं से रूबरू होते। सूचना प्रसारण मंत्रालय तक यह प्रस्ताव भेजा गया और उसके बाद इसे गृह मंत्रालय से पास करवाया जाना था।
मगर अभी तक गृह मंत्रालय की ओर से आदेश न मिल पाने से मामला लटक गया है। लखनऊ विवि में तो यह प्रस्ताव वर्ष 2007 में तैयार किया गया था। यहां तो कम्यूनिटी रेडियो को शुरू करने के लिए फ्रिक्वेंसी तक एलॉट होने वाली थी, लेकिन काम बीच में रुक गया।
इसके बाद किसी भी कुलपति ने इसमें दिलचस्पी नहीं दिखाई। ऐसे में मॉस कम्युनिकेशन विभाग द्वारा तैयार किया गया प्रस्ताव ठंडे बस्ते में चला गया। इस कम्यूनिटी रेडियो को शुरू करने से हर महीने का खर्चा 50 हजार रुपये है।
ऐसे में विश्वविद्यालय प्रशासन इसमें दिलचस्पी नहीं दिखा रहा। वहीं, बीबीएयू प्रशासन का दावा है कि उसने अब कम्यूनिटी रेडियो जल्द शुरू करवाने के लिए कमर कस ली है और जल्द ही इसका लाभ सभी को मिलना शुरू होगा।
एलयू के प्रवक्ता प्रो. एनके पांडेय ने बताया कि एलयू प्रशासन हर अच्छी पहल को लागू करने पर जोर देता है। पहले कम्यूनिटी रेडियो शुरू करने का प्रस्ताव क्यों और किस कारण से रोक दिया गया।
इसकी जानकारी नहीं है। फिलहाल इस प्रस्ताव को अगर अब दोबारा हमारे सामने ढंग से रखा जाएगा तो इस पर गंभीरता से विचार करेंगे। हर अच्छी पहल के लिए हम तत्पर रहते हैं।