नए साल की दस्तक साफ सुनी जा सकती है। यह साल यानी 2014 महज 10 दिन का मेहमान है। वक्त आ चुका है, यह हिसाब कर लिया जाए, इस साल से क्या मिला? साथ ही एक नजर डाली जाए, उम्मीद की उस किरण पर भी, जो नए साल का सूरज अपने साथ लेकर आएगा।
इस दौरान विभिन्न क्षेत्रों में उपलब्धि हासिल करने वाले ऐसे लोगों की भी बात होगी, जो जीवन में किसी के लिए भी प्रेरणादायी हो सकते हैं। शुरुआत आज से उच्च शिक्षा के साथ। उच्च शिक्षा की गाड़ी चुनिंदा मुद्दों में फंसी हिचकोले खाती रही। एक नजर इस क्षेत्र में रहे हालात, उम्मीद और उपलब्धि हासिल करने वालों पर....
आफत-सांध्यकालीन कक्षाएं
सांध्यकालीन कक्षाएं इस साल शिक्षा के क्षेत्र में सबसे बड़ा मुद्दा बना रहा। इसे लेकर झिक-झिक होती रही। दरअसल, प्रदेश में उच्च शिक्षा के बुरे हालातों पर हाईकोर्ट में एक याचिका दायर हुई थी, जिस पर फैसला लेते हुए हाईकोर्ट ने केवल अनुमन्य सीटों पर ही हर कॉलेज में दाखिले की बात कही थी।
इस वजह से प्रदेश के सबसे बड़े महाविद्यालय डीएवी पीजी कॉलेज सहित तमाम कालेजों में भारी संख्या में छात्र दाखिले से वंचित हो गए। ऐसे में प्रदेश सरकार ने छात्रों की सुविधा को देखते हुए ईवनिंग क्लासेज चलाने की घोषणा कर दी, लेकिन दिसंबर बीत गया, यह केवल सरकारी कॉलेजों तक ही सीमित रह गई। अन्य कॉलेजों के छात्र अभी भी आंदोलनरत हैं।
राहत-पैरामेडिकल संस्थानों की संबद्धता
सांध्यकालीन कक्षाओं पर झिक-झिक के बीच पैरामेडिकल संस्थानों की संबद्धता का मामला सुलझ जाना साल की एक बड़ी उपलब्धि रही। अमर उजाला ने ही इस मुद्दे को उठाया था। दरअसल, प्रदेश में जितने भी पैरामेडिकल संस्थान चल रहे हैं, उनकी संबद्धता पूरी नहीं थी।
गढ़वाल विश्वविद्यालय राज्य सरकार की ओर से भेजे जाने वाले पत्र के आधार पर छात्र-छात्राओं को परीक्षा में बैठने देता था। ऐसा सन् 2004-05 से चला आ रहा था, लेकिन इस साल विश्वविद्यालय ने प्रथम वर्ष के छात्र-छात्राओं को अपूर्ण संबद्धता की वजह से परीक्षा में बैठने से इंकार कर दिया।
ऐसे में राज्य सरकार ने वर्षों से रुके पड़े पैरामेडिकल संस्थानों की अनापत्ति प्रमाण पत्र(एनओसी) को स्वीकृति दी। इसके अलावा हाईकोर्ट ने भी छात्र-छात्राओं के हित में ही फैसला दिया।