नेशनल एसेसमेंट एंड एक्रिडिएशन काउंसिल (नैक) की ग्रेडिंग में सूबे के सरकारी विश्वविद्यालयों के लिए बजट सबसे बड़ी बाधा बन रहा है। अब तक प्रदेश में केवल एक कुमाऊं विवि को नैक का ‘ए’ ग्रेड मिला हुआ है। बाकी विश्वविद्यालयों को सरकार से पूरा बजट और इंफ्रास्ट्रक्चर न होने की वजह से वह गुणवत्ता के मामले में पिछड़ रहे हैं।
सूबे में उच्च शिक्षा के हर आयाम में युवाओं की उपस्थिति बढ़ाने के लिए सरकार ने भारी संख्या में विश्वविद्यालय खोले। वर्ष 2005 में तो एक साथ कई विवि स्थापित किए गए। स्थापना के बाद सरकार बजट के मामले में उदासीन होती चली गई। इन विश्वविद्यालयों के लिए सबसे बड़ी मुश्किल बजट का न मिलना ही है। इस वजह से कहीं न कहीं विवि शिक्षा की गुणवत्ता में पिछड़ रहे हैं।
यह है सरकारी विश्वविद्यालयों का आलम
- दून विश्वविद्यालय : आज तक स्टाफ पूरा नहीं। इंफ्रास्ट्रक्चर भी अधूरा।
- कुमाऊं विश्वविद्यालय : नए आयाम स्थापित कर हाल ही में नैक ए ग्रेड हासिल किया।
- उत्तराखंड तकनीकी विश्वविद्यालय : आज तक स्थायी कर्मचारी नहीं, बजट के मामले में भी सरकार उदासीन।
- जीबी पंत विवि : एग्रीकल्चर में अलग पहचान लेकिन बजट न मिलने से हालात बदतर।
- उत्तराखंड मुक्त विवि : यहां भी कर्मचारियों की कमी और बजट की वजह से परेशानी।
- उत्तराखंड संस्कृत विवि : आज तक विवि ने स्थापना के बाद आगे कदम नहीं बढ़ाए। सरकार बजट देने में उदासीन।
- उत्तराखंड आयुर्वेद विवि : स्थापना के दो साल तक एक कमरे में चलने के बाद अपना परिसर तो मिला लेकिन अभी बजट की दरकार।
- उत्तराखंड यूनिवर्सिटी ऑफ हॉर्टिकल्चर एंड फॉरेस्ट्री : विवि की स्थापना के बाद से ही आज तक पूरा स्टाफ नहीं दिया गया। बजट की वजह से संचालन मुश्किल।
- श्रीदेव सुमन उत्तराखंड विवि : विवि को दून में कैंपस के लिए जमीन दी गई लेकिन आज तक मिली नहीं। स्थायी कर्मचारियों की संख्या हाल ही में कुछ बढ़ी लेकिन सरकार बजट देने में उदासीन।
- हेमवती नंदन बहुगुणा चिकित्सा विवि : विवि की स्थापना से लेकर अब तक अपनी बिल्डिंग नहीं। ऐसे में बजट न मिलने से विवि अपने मकसद में नाकाम।
इनका है कहना
उत्तराखंड सरकार का एजुकेशन को लेकर कोई प्लान नहीं है। अगर मुझे एक मंत्री के तौर पर उत्तराखंड की शिक्षा को संभालनी होती तो जो इतनी संख्या में विवि हैं, सभी अलग ही नजर आते। सरकार के पास मैनेजमेंट नहीं है, गवर्नेंस नहीं है। जैसे ही विवि पैसा कमाने लगते हैं तो शासन की उन पर भी नजर पड़ जाती है। सरकार को इस ओर गंभीर होना होगा।
-डॉ. दुर्ग सिंह चौहान, पूर्व कुलपति यूटीयू