चीन के सेंट्रल बैंक द्वारा युआन का 1.9 फीसदी अवमूल्यन किए जाने का प्रभाव तत्काल दिखा। मंगलवार को डॉलर के मुकाबले रुपया 64.26 के स्तर पर आ गया। बुधवार को रुपये में और गिरावट दर्ज की गई और यह 64.86 के स्तर पर आ गया।
इससे संकेत मिलता है कि युआन के अवमूल्यन के बाद डॉलर के मुकाबले रुपये के 64-65 के स्तर पर रहने पर सरकार खुश है। युआन का अवमूल्यन निश्चित रूप से भारत और यहां के निर्यातकों के लिए अच्छी खबर नहीं है।
पिछले छह महीने से निर्यात में वैसे भी गिरावट रही है और चीन के इस कदम से भारतीय रुपये का आगे चल कर भी अवमूल्यन होगा जिससे निर्यात पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।
लेकिन कुछ लोग हैं आशावादी
भारतीय निर्यातक जहां इस कदम से प्रतिस्पर्धात्मक तौर पर कमजोर हो जाएंगे
वहीं चीन को सस्ते आयात का लाभ मिलेगा और निर्यातकों को अब यह भय सता रहा
है कि चीन की कंपनियां भारतीय बाजार में अपने उत्पादों की बाढ़ लाएंगे।
हालांकि,
ऐसा माना जा रहा है कि रुपये के मूल्य में गिरावट आईटी और फार्मा सेक्टर
के भारतीय निर्यातकों के लिए अच्छा है। हालांकि, चीन पर केंद्रित भारतीय
कंपनियों पर इस खबर का असर दिखने लगा है क्योंकि युआन के अवमूल्यन से देश
में आयात महंगा हो जाएगा।
हालांकि, कुछ लोग आशावादी हैं और मानते हैं कि युआन के अवमूल्यन से कमोडिटी की कीमतों गिरावट आएगी जिससे भारत को मदद मिलेगी।
चीन से आयात होगा सस्ता : वित्त सचिव
वित्त सचिव राजीव महर्षि ने कहा कि युआन के अवमूल्यन से लगता है कि चीन लचीले विनिमय दर की का रुख कर रहा है। उन्होंने कहा, ‘मेरे ख्याल से हमारे निर्यात पर इसका कुछ प्रभाव होना चाहिए। चीन से निर्यात सस्ता होगा लेकिन इसके प्रभावों के बारे में कुछ कहना मुश्किल है।’
फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गेनाइजेशन के अध्यक्ष एससी रल्हन ने कहा, ‘युआन के अवमूल्यन से चीन के अलावा अन्य देशों को किया जाने वाला भारतीय निर्यात भी प्रभावित होगा, क्योंकि चीन के निर्यात से प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी।
इससे चीन से आयात भी बढ़ेगा जिसके पास विभिन्न सेक्टरों में निर्माण की अतिरिक्त क्षमता है। अपने कारोबारी रक्षा उपायों को हमें तैयार रखना होगा ताकि अगर चीन डंपिंग की सोचे तो उससे निपटा जा सके।’
चीन के इस कदम से आयात बढ़ सकता है जिससे भारत का कारोबारी घटा भी बढ़ेगा जो पहले ही 50 अरब डॉलर को छू चुका है।
सरकार को उठाने चाहिए कदम
एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि भारतीय बाजार में पहले से ही सस्ते चीनी सामान भरे पड़े हैं। युआन के अवमूल्यन के बाद चीन से स्टील पावर उपकरणों और अन्य उत्पादों के आयात में बढ़ोतरी हो सकती है जिससे घरेलू निर्माताओं को नुकसान होगा।
रल्हन ने कहा, ‘हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि चीन के लिए भारत डंपिंग की जगह न बने जैसा की स्टील के मामले में देखा गया। भारतीय उद्योग पहले से ही अंतरराष्ट्री कंपनियों की तुलना में उच्च ब्याज दर और परिवहन लागत से जूझ रहा है।
सरकार को घरेलू स्तर पर संतुलित माहौल सुनिश्चित करना चाहिए और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए समर्थन भी करना चाहिए।’