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बजट में दूरगामी सोच वाले कड़े फैसलों की जरूरत

Sun, 06 Jul 2014 09:15 PM IST
प्रदीप एस मेहता, महासचिव कट्स इंटरनेशनल
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पिछली सरकार ने वित्त वर्ष 2013-2014 के राजस्व घाटे को सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 4.5 फीसदी पर सीमित कर, स्थिति अनुमान से बेहतर रहने का दावा किया था। सरकारी खर्चों में भारी कटौती किये बिना ऐसा करना संभव नहीं था।
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ऐसे में पिछली सरकार के किये का नतीजा सरकार और जनता को आने वाले समय में भुगतना होगा। ऐसी स्थिति दोबारा उत्पन्न न हाने पाए इसक लिए केंद्र की नई सरकार को दूरगामी सोच के साथ बिना हिचकिचाए आगामी बजट में कड़े कदम उठाने होंगे। साथ ही अपने इन फैसलों का औचित्य जनता को ठीक से समझाने की भी जरूरत होगी। वित्त मंत्री अरुण जेटली पहले ही लोक लुभावन बातों से बचने की कह चुके हैं। उनके लिए अब इस कथनी को करनी में बदलने का समय है।

जनता को मुंगेरीलाल के सपने दिखाने से बचते हुए। सच का सामना करवाना होगा। यह साफ शब्दों में बतलाने की जरूरत है की राजस्व की स्थिति सुधारने में लगभग 2 साल लग सकते है और इसके लिए कर और अनुदान नीति में आमूल-चूल बदलाव की आवश्यकता है।
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सरकार को एक दीर्घकालीन राजस्व नीति तैयार करके उसके जरिए सुधारों को अमल में लाने की जरूरत है। इसके साथ ही प्रत्यक्ष करों की नीतियों का पुनर्गठन करते हुए लोगों को करों का भुगतान करके देश के विकास में योगदान के लिए प्रेरित करना होगा। इसके लिए यह सुनिश्चित किया जना चाहिए की जनता से एकत्र राशि का उपयोग विकास कार्यों के लिए ही हो और निरर्थक खर्चों से बचा जाए।

इसके लिए विकसित देशों की तर्ज पर एक स्वतंत्र विशेषज्ञ संस्थान का गठन किया जा सकता है, जो सरकार को बजट बनाने में सहायता करे और उसके क्रियान्वयन की समीक्षा करे। ऐसा करके मोदी सरकार अपने पहले बजट देश के ऐतिहासिक बजटों में दर्ज करा सकती है। नई सरकार का पहला की दीर्घकालीन नीतियों को स्पष्ट करने वाला होना चाहिए।
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