पेट्रोल, डीजल के बाद अब चीनी को भी सरकार ने बाजार के हवाले कर दिया है। इसका साफ मतलब है कि चीनी की मिठास के लिए जेब और ढीली करनी पड़ेगी।
आर्थिक मामलों की कैबिनेट समिति (सीसीईए) ने बृहस्पतिवार को चीनी उद्योग को आंशिक रूप से नियंत्रण मुक्त करने पर अपनी मुहर लगा दी। अब चीनी मिलें खुले बाजार में अपनी सुविधा के हिसाब से चीनी बेच सकेंगी।
10 फीसदी लेवी कोटे की बाध्यता खत्म
मिलों पर लागू 10 फीसदी लेवी कोटे की बाध्यता भी खत्म कर दी गई है। अब सरकार पीडीएस के लिए बाजार भाव पर मिलों से चीनी खरीदेगी। लेकिन जनता को रियायती दर पर राशन की चीनी मिलती रहेगी।
खरीद और बिक्री का अंतर सरकार खुद सब्सिडी के जरिए उठाएगी। इस पर करीब 5300 करोड़ रुपये का खर्च होगा। वहीं, गन्ना मूल्य निर्धारण के विवादित मुद्दे को राज्यों पर छोड़ दिया है। लेवी कोटे से मिलों को फिलहाल दो साल के लिए छूट दी गई है।
केंद्रीय खाद्य एवं उपभोक्ता मामलों के मंत्री केवी थॉमस ने कहा कि अब चीनी मिलें सरकार को सस्ती दर पर चीनी बेचने के लिए बाध्य नहीं होंगी।
चीनी बेचने पर कोई पाबंदी नहीं
साथ ही खुले बाजार में चीनी बेचने पर भी कोई पाबंदी नहीं रहेगी। उत्पाद शुल्क और आयात-निर्यात की नीति यथावत रहेगी।
थॉमस ने इस फैसले को उद्योग, किसान और उपभोक्ता के हित में बताया है। उनका कहना है कि लेवी कोटे को खत्म करने का पूरा बोझ सरकार खुद उठा रही है। इसलिए महंगाई बढ़ने का सवाल ही नहीं है। सरकार पीडीएस के लिए अधिकतम 32 रुपये प्रति किलोग्राम के दाम पर चीनी खरीदेगी।
चीनी उद्योग को नियंत्रण मुक्त करने के लिए प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार समिति (पीएमईएसी) के अध्यक्ष सी. रंगराजन की अध्यक्षता में समिति गठित की गई थी। इस समिति ने गत अक्तूबर में सरकार को रिपोर्ट सौंपी थी। ताजा फैसला इस समिति की सिफारिशों की लाइन पर ही किया गया है।
चीनी उद्योग ने स्वागत किया
इंडियन शुगर मिल्स एसोसिएशन (इस्मा) के महानिदेशक अविनाश वर्मा का कहना है कि लेवी कोटे का बोझ हटने से चीनी मिलों को सालाना करीब 3 हजार करोड़ रुपये की बचत होगी। जिससे किसानों को समय पर भुगतान करने और गन्ने का बेहतर दाम देने में मदद मिलेगी।
उन्होंने चीनी के महंगे होने की आशंकाओं को खारिज कर दिया। सहकारी चीनी मिलों के राष्ट्रीय महासंघ के प्रबंध निदेशक विनय कुमार का कहना है कि चीनी उद्योग के हित में यह ऐतिहासिक फैसला है। अब 10 फीसदी चीनी सरकार को सस्ते दाम पर देने की बाध्यता नहीं रही। यह चीनी खुले बाजार में आएगी तो दाम कम हो सकते हैं।
क्या कहते हैं किसान नेता
खुले बाजार में बिक्री और लेवी का नियंत्रण हटने से चीनी मिलें त्योहारों पर मिलीभगत कर दाम बढ़ा सकती हैं। सरकार का यह फैसला उपभोक्ताओं के खिलाफ है। किसानों के संघर्ष की वजह से सरकार गन्ना मूल्य और आरक्षित क्षेत्र से जुड़ी रंगराजन समिति की सिफारिशें लाग नहीं कर पाई है। - सरदार वीएम सिंह, संयोजक, राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन
चीनी मिल मालिक हमेशा लेवी कोटे की पाबंदी का रोना रोते थे। अब देखना है कि सरकार ने जो 3 हजार करोड़ रुपये की राहत मिलों को दी है, उसका कितना हिस्सा किसानों तक पहुंचता है। कम से कम अब मिलों के पास भुगतान में देरी के लिए लेवी कोटे का बहाना नहीं रहा। - राकेश टिकैत, प्रवक्ता, भारतीय किसान यूनियन