रूस के राष्ट्रपति व्लादीमीर पुतिन की 10 दिसंबर से शुरू होने वाली तीन दिवसीय भारत यात्रा को लेकर सबसे ज्यादा उम्मीदें ऊर्जा क्षेत्र में भारत और रूस के बीच सहयोग का एक नया दौर शुरू होने को लेकर हैं। सबकी नजरें पुतिन और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच रूस से भारत के बीच अंतरराष्ट्रीय गैस पाइपलाइन बिछाने के समझौते पर टिकी हुई हैं। दोनों देशों के बीच यह करार भारत की ऊर्जा सुरक्षा नीति को काफी बल दे सकता है।
सरकार से जुड़े सूत्रों का बताना है कि यूक्रेन में विद्रोहियों को समर्थन देने के चलते अंतरराष्ट्रीय दबाव और पश्चिमी देशों की ओर से प्रतिबंध झेल रहे रूस की ओर से भारत के साथ सहयोग के लिए हाथ बढ़ाए जाने की काफी मजबूत संभावनाएं हैं। ऐसे में पुतिन की भारत यात्रा के दौरान दोनों देश ऊर्जा और रक्षा क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने की दिशा में कदम बढ़ा सकते हैं।
सूत्रों के मुताबिक आपसी सहयोग बढ़ाने को लेकर दोनों देश पहले से ही रूस से भारत के बीच हाइड्रोकार्बन पाइपलाइन बिछाने की संभावनाओं का अध्ययन कर रहे हैं। दोनों देशों के बीच हाइड्रोकार्बन के सीधे परिवहन को लेकर एक संयुक्त अध्ययन दल गठित किया जा चुका है। रूस की ऊर्जा क्षेत्र की दिग्गज कंपनी गैजप्रॉम इस गैस पाइप लाइन के रूट को चिह्नांकित करने के काम में पहले से ही सक्रिय भूमिका निभा रही है।
तेल और गैस के क्षेत्र में हाल के वर्षों में कुछ सुस्त हुई भारत और रूस की सहभागिता को रूस अब एक नई तेजी देना चाहता है। वैंकोर तेल क्षेत्र में चीन को 1 अरब डॉलर में 10 फीसदी हिस्सेदारी बेचने के बाद रूस की सबसे बड़ी तेल कंपनी रोसनेफ्ट भारत की सरकारी पेट्रोलियम कंपनी ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉरपोरेशन विदेश लिमिटेड (ओवीएल) को भी ऐसी ही पेशकश कर चुकी है।
रोसनेफ्ट ओवीएल को साइबेरिया स्थित तेल क्षेत्र में 10 फीसदी हिस्सेदारी खरीदने का औपचारिक प्रस्ताव दे चुकी है। दूसरी ओर ओवीएल ने इस तेल क्षेत्र में 25 फीसदी हिस्सेदारी खरीदने की इच्छा इस शर्त के साथ जताई है कि उसे अपने द्वारा उत्पादित तेल को सीधे बाजार में बेचने की भी छूट दी जाए। 1 जनवरी 2014 तक के आकलन के मुताबिक वेंकोर फील्ड में 50 करोड़ टन तेल और 182 अरब घन मीटर गैस मौजूद होने का अनुमान है।
यूक्रेन के घटनाक्रम में रूस की भूमिका के चलते उस पर पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों का असर ओवीएल द्वारा 2008 में खरीदी गई कंपनी इंपीरियल एजर्नी के उत्पादन पर भी पड़ रहा है। ओवीएल को इससे अपने तेल क्षेत्र में उत्पादन करने में दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में ओवीएल का मानना है कि तेल उत्पादन के लिए उसे उचित कर राहत दी जानी चाहिए क्योंकि इस तेल क्षेत्र से तेल निकालने के लिए उसे अत्याधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करना पड़ रहा है। इससे उसकी उत्पादन लागत बढ़ रही है। इसके अलावा पश्चिमी देशों की ओर से लगाए गए प्रतिबंधों के चलते उसके लिए पश्चिमी देशों की कंपनियों से तेल उत्पादन की उन्नत तकनीक और उपकरणों को हासिल कर पाना भी काफी कठिन हो गया है।
रूस ने हालांकि पिछले साल कुछ कर राहत देने की घोषणा की है, पर ओवीएल का कहना है कि साइबेरिया के कठिन हालात, खराब मौसम और कर की ऊंची दरों के चलते उसकी उत्पादन लागत काफी अधिक बैठ रही है और रूस की ओर से दी गई कर राहत इस लिहाज से पर्याप्त नहीं है। ऐसे में उम्मीद की जा रही है कि 2012 में ओवीएल को विशेष कर छूट देने से रूस के इनकार के बाद अब उसे कर राहत मिल सकती है।
उस समय रूस ने इंपीरियल एनर्जी पर लागू कर की दरों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्य मानकों के अनुरूप बताते हुए कोई अतिरिक्त छूट देने से इनकार कर दिया था। ओवीएल को रूस की ओर से अब कुछ विशेष कर छूट मिल सकती है।