रिटायरमेंट लेने के दो साल के भीतर ही एन आर नारायण मूर्ति को एग्जिक्यूटिव भूमिका में लौटना पड़ा है। वजह साफ है। उनकी कंपनी इंफोसिस गहरे संकट में है। मुनाफा लुढ़क रहा है, शेयर पिट रहा था और आगे की राह भी काफी धुंधली है।
इंफोसिस में मूर्ति की वापसी ने निवेशकों, ग्राहकों और कर्मचारियों को उम्मीद की किरण दिखाई है और अब उन पर इस बड़ी जिम्मेदारी को पूरा करने का भार है।
ऐसे में वे ग्लोबल लेवल के इन सीईओ से सीख ले सकते हैं, जो कंपनी में एग्जिक्यूटिव भूमिका से हटे और अलग-अलग वजहों से लौटकर बड़ा कमाल कर दिया।
स्टीव जॉब्स, एप्पल
एप्पल के पूर्व सीईओ स्टीव जॉब्स को बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स से तकरार के बाद 1985 में कंपनी से जाना पड़ा था। लेकिन वह 1997 में अंतरिम सीईओ के रूप में लौटे और 2000 में परमानेंट हुए। इसके बाद उनकी अगुवाई में कंपनी ने आईफोन, आईपैड से क्या कमाल कर दिखाया, हम सभी जानते हैं।
लैरी पेज, गूगल
एरिक शिमिट के 2001 में सीईओ बनने के बाद गूगल के संस्थापक लैरी पेज नेपथ्य में चले गए। दरअसल, निवेशक चाहते थे कि कोई प्रोफेशनल सीईओ कामकाज संभाले। लेकिन जनवरी 2011 में पेज कंपनी को दोबारा मजबूत बनाने लौटे और केवल दो साल के अंतराल में ही गजब कर दिया।
होवार्ड शुल्ट्ज, स्टारबक्स
दुनिया भर में कॉफी चेन चलाने वाली यह कंपनी 2000 में संघर्ष के दौर से गुजर रही थी और शुल्ट्ज को रिटायर होना पड़ा। लेकिन इससे कोई फायदा नहीं हुआ। 2008 में वह फिर लौटे और पांच साल में न केवल कंपनी के मौजूदा बाजार को मजबूत बनाया बल्कि भारत समेत कई नए बाजारों में कदम रखा।
एजी लाफ्ले, पीएंडजी
सामान्य प्रक्रिया के तहत लाफ्ले ने प्रॉक्टर एंड गैम्बल को 2010 में टाटा कहा। लेकिन कंपनी के लगातार गिरते प्रदर्शन ने उन्हें दोबारा आने पर मजबूर किया। पिछले महीने वह कंपनी में दोबारा एग्जिक्यूटिव भूमिका में लौटे हैं और उम्मीद की जा रही है कि जल्द ही कंपनी की सूरत बदलेगी।