ग्लोबल रेटिंग एजेंसी मूडीज ने देश के बैंकिंग सेक्टर के लिए अपने निगेटिव आउटलुक को बरकरार रखा है। मूडीज का कहना है कि कॉरपोरेट सेक्टर द्वारा बैंकों की प्रक्रियाओं में ढीलेपन का लाभ उठाए जाने से बैंकों की परिसंपत्तियों की गुणवत्ता (ऐसेट क्वालिटी) सुधार हो पाना मुश्किल दिखता है।
मूडीज की ओर से सिंगापुर में इस संबंध में जारी वक्तव्य में कहा गया है कि देश की बैंकिंग प्रणाली के परिदृश्य (आउटलुक) को लेकर हमारा नजरिया अब भी नकारात्मक (निगेटिव) है, जैसा कि यह नवंबर 2011 में था। निगेटिव आउटलुक के पीछे हमारा विचार यह है कि कारपोरेट सेक्टर द्वारा लाभ उठाए जाने के चलते बैंकिंग क्षेत्र की परिसंपत्तियों की गुणवत्ता में सुधार के आसार कम है। यह अर्थव्यवस्था की मजबूत रिकवरी के लिहाज से भी बाधक है।
रिपोर्ट में भारतीय बैंकों की परिसपत्तियों की खराब गुणवत्ता का जिक्र करते हुए बैंकों की कुल गैर निष्पादित परिसंपत्तियां (एनपीए) 4.5 फीसदी तक पहुंचने के आसार जताए गए हैं। इसमें सुधार के लिए लोन की प्रोविजनिंग और पूंजीगत उपाय किए जाने की जरूरत जताई गई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकारी बैंकों की लाभदेयता बढ़ने से लोन कारोबार में बढ़ोतरी के लिए पर्याप्त पूंजी उपलब्ध हो सकती है।
मूडीज के निगेटिव आउटलुक का मुख्य कारण सरकारी बैंकों का भारी-भरकम एनपीए है, क्योंकि बैंकों की कुल परिसंपत्तियों में करीब 70 फीसदी हिस्सेदारी इन्हीं की है। मूडीज का कहना है कि सरकारी बैंकों के एनपीए और रीस्ट्रक्चर लोन में निजी बैंकों की तुलना में ज्यादा बढ़ोतरी हो रही है, दूसरी ओर इनका मुनाफा निजी बैंकों की अपेक्षा कमजोर है।
रिपोर्ट के मुताबिक सरकारी बैंकों की इस बुरी स्थिति में सुधार की कोई खास गुंजाइश नहीं दिखती है।
आर्थिक विकास दर को लेकर मूडीज की रिपोर्ट में कहा गया है कि दो साल तक 5 फीसदी से कम रहने के बाद चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में विकास दर 5.7 फीसदी पर रहना बेहतर संकेत है। देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में इस साल सुधार देखने को मिलेगा। हालांकि ऊंची महंगाई दर के चलते कर्ज की ब्याज दरें अधिक रहने से इसपर दबाव भी बना रहेगा।