एक लीटर डीजल बेचने में सरकारी तेल कंपनियों का घाटा बढ़ कर साढ़े चौदह रुपए तक पहुंच गया है। यही वजह है कि सरकार सस्ता डीजल बेचने से बढ़ रही सब्सिडी का बोझ कम करने के तरीके ढूंढ़ने में लगी है।
एक आधिकारिक बयान में कहा गया है कि एक लीटर डीजल की बिक्री पर घाटा 12.12 रुपए से बढ़ कर 14.50 रुपए पर पहुंच चुका है। रुपए की कीमत में गिरावट की वजह से यह घाटा बढ़ा है।
इंडियन ऑयल लिमिटेड, हिन्दुस्तान पेट्रोलियम और भारत पेट्रोलियम को लागत से कम पर डीजल, रसोई गैस और केरोसिन बेचने पर रोजाना 486 करोड़ रुपए का सम्मिलित घाटा हो रहा है। महंगाई ज्यादा न बढ़े इसलिए सरकारी तेल कंपनियां लागत से कम पर पेट्रोलियम उत्पाद बेच रही हैं।
डीजल के अलावा लागत से कम पर केरोसिन बेचने पर इन कंपनियों को हर लीटर पर 36.83 रुपए का घाटा हो रहा है। इसी तरह 14.2 किलो के रसोई गैस सिलेंडर पर 470.38 रुपए का घाटा हो रहा है।
पिछले साल जनवरी में डीजल पर प्रति लीटर 14 रुपए का घाटा हो रहा था। इंडियन ऑयल के मुताबिक सस्ते डीजल, रसोई गैस और केरोसिन बेचने की वजह से तीनों को मौजूदा वित्त विर्ष के दौरान 1,56,000 करोड़ के राजस्व का घाटा होगा।
वित्त वर्ष 2012-13 के दौरान कंपनियों को 1,61,029 करोड़ रुपए का घाटा हुआ था। इसमें से आधे की भरपाई सरकार इन कंपनियों की नकद सब्सिडी देकर करती है।
बहरहाल डीजल पर हो रहे घाटे को देखते हुए सरकार हर महीने इसकी कीमत में इजाफे को दोगुना करने का विकल्प आजमा सकती है। या फिर वह तीन से पांच रुपए की एकमुश्त बढ़ोतरी कर सकती है।
डीजल में प्रति लीटर एक रुपए की बढ़ोतरी करने से मौजूदा वित्त वर्ष में कंपनियों का घाटा 4,522 करोड़ रुपए कम हो जाएगा।