आम चुनावों के परिणाम का शेयर बाजारों पर भी असर पड़ना स्वाभाविक है। पिछले आम चुनावों के दौरान बाजार की चाल से इसे समझना आसान है। बीते वर्षों में चुनाव पूर्व बाजारों में तेजी देखने को मिली थी, लेकिन चुनाव के बाद जब यह वास्तविकता सामने आई कि अर्थव्यवस्था में कोई भी बड़े बदलाव लांग टर्म में ही हो सकते हैं, शेयर बाजार वापस अपने वास्तविक स्तर पर आ गए।
इस बार भी हम कुछ ऐसे ही उतार-चढ़ाव की उम्मीद कर सकते हैं। हालांकि, चुनावी नतीजे के दिन बाजारों में आश्चर्यजनक बदलाव की उम्मीद की जा सकती है। इंडियानिवेश सिक्यूरिटीज के रिसर्च हेड दलजीत एस. कोहली का कहना है कि आम चुनाव के इस बार पर परिणाम क्या रहेंगे, फिलहाल इसका अनुमान लगाना संभव नहीं है। फिर भी, इंडियानिवेश ने चुनावी नतीजों के अलग-अलग तीन परिदृश्य के आधार पर बाजार की संभावित चाल सामने रखी है।
अगर UPA सत्ता में आती है दोबारा
यदि यूपीए दोबारा सत्ता में आता है तो शेयर बाजार शुरुआत में नकारात्मक रुख दिखा सकते हैं, क्योंकि यह बहुमत की उम्मीदों के विपरीत होगा।
ऐसे में आर्थिक सुधार का अगला दौर शुरू करने की बजाय नीतिगत जड़ता और लोकलुभावन घोषणाओं की प्राथमिकता मिलेगी। वहीं, कमजोर नेतृत्व का भी कोई समाधान सामने नहीं आ पाएगा।
NDA सरकार बनने पर
भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की सरकार बनती है। इसमें दो परिस्थितियां हैं। पहली, भाजपा 272 या इससे अधिक सीटों के साथ प्रभावकारी स्थिति में रहे। दूसरी, भाजपा की स्थिति कमजोर रहे और वह बड़ी संख्या में छोटी-छोटी पार्टियों (खासकर क्षेत्रीय दलों) के साथ मिलकर सरकार बनाए।
पहली परिस्थिति अर्थात यदि भाजपा स्पष्ट बहुमत हासिल करती है और नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बनते हैं, तब भी अर्थव्यवस्था की हालत में तत्काल व्यापक बदलाव की उम्मीद नहीं है। अर्थव्यवस्था पर मोदी इफेक्ट करीब एक साल के बाद ही नजर आएगा। लेकिन, चुनाव के इस नतीजे का शर्ट टर्म नजरिए से शेयर बाजारों पर सकारात्मक असर होगा। हालांकि, कुछ दिनों बाद बाजार अपने वास्तविक स्तर पर कारोबार करने लगेगा।
यदि BJP को नहीं मिलती है बहुमत
दूसरी परिस्थिति यानी यदि भाजपा बहुमत में रहती है लेकिन जरूरी संख्याबल से नीचे रहती और वह छोटे क्षेत्रीय दलों के साथ मिलकर सरकार बनाती है, तो इस स्थिति में बाजार की चाल परिदृश्य- एक जैसी ही दिखाई देगी।
इस तरह के चुनावी नतीजे का मतलब होगा कि भाजपा अहम बिलों और सुधार के कार्यक्रमों को आगे बढ़ाने में सक्षम नहीं हो पाएगी। ऐसे राजनीतिक नेतृत्व में आर्थिक विकास के तेजी के रास्ते पर लौटने की बहुत अधिक उम्मीद नहीं होगी।
तीसरे मोर्चे की सरकार बनने पर
यदि तीसरे मोर्चे या अन्य दूसरे दलों का कोई समूह सरकार बनाता है, तो यह बाजारों के लिए सबसे खराब स्थिति होगी। यदि ऐसा होता है तो शेयर बाजारों में तेज और सपाट गिरावट दिखाई दे सकती है। हालांकि, इस तरह के नतीजे की उम्मीद बहुत अधिक नहीं है।