देश के शिपिंग उद्योग में विस्तार की व्यापक संभावनाएं मौजूद हैं। इस सेक्टर में निवेश आकर्षित करने और नए अवसर तैयार करने के लिए सरकार को जरूरी सुविधाएं सुनिश्चित करने पर जोर देना चाहिए। उद्योग संगठन एसोचैम की एक रिपोर्ट बताती है कि देश का समुद्री व्यापार सालाना औसतन आठ फीसदी से अधिक की दर से बढ़ रहा है और 2016-17 तक यह 83 करोड़ टन को पार कर सकता है।
एसोचैम की ओर से ‘शिपिंग उद्योग : आज और कल’ विषय पर कराए गए एक अध्ययन की रिपोर्ट के मुताबिक शिपिंग उद्योग में 17,000 करोड़ रुपये के भारी-भरकम के निवेश की आवश्यकता है। बंदरगाहों की क्षमता मौजूदा करीब 69 करोड़ टन है, जिसे 14 करोड़ टन से अधिक बढ़ाने की जरूरत है।
कोच्चि में यह रिपोर्ट जारी करते एसोचैम के महासचिव डीएस रावत ने कहा कि शिपिंग उद्योग में इतने बड़े पैमाने पर निवेश के लिए निजी क्षेत्र की भागीदारी अनिवार्य है। भारत में बंदरगाहों के विकास और उनकी क्षमता बढ़ाने के लिए निजी क्षेत्रों के लिए पर्याप्त अवसर मुहैया कराने, आंतरिक संपर्क को मजबूत बनाने, सड़क, रेल एवं बंदरगाह प्राधिकारों के बीच परस्पर समन्वय की कमी को दूर करने जैसे कुछ अहम कदम उठाने होंगे।
उन्होंने कहा कि शिपिंग उद्योग में नए निवेश के लिए अवसरों का सृजन करने में सरकार को एक फैसिलिटेटर की तरह कार्य करने की जरूरत है। भारत के समुद्री जहाजों के बेड़े में शामिल करीब 41 फीसदी की उम्र 20 साल से अधिक है। इससे साफ जाहिर होता है कि बड़े में नई समुद्री जहाजों के शामिल करने की दर कितनी धीमी है।
देश की 7,300 करोड़ रुपये से अधिक की शिप बिल्डिंग एवं शिप- रिपेयर इंडस्ट्री के लिए यह शुभ संकेत हैं। क्योंकि, 20 से अधिक उम्र वाले जहाजों को जल्दी-जल्दी और बड़े पैमाने पर मरम्मत और रखरखाव की जरूरत होती है।
हालांकि, वैश्विक स्तर पर यह भारतीय समुद्री बेड़े को कम प्रतिस्पर्धी बनाते हैं, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय व्यापार में 15 साल से कम उम्र के जहाजों को तरजीह दी जाती है। इसके चलते बीते कुछ सालों में विदेशी व्यापार में भारतीय जहाजों की हिस्सेदारी में कमी आई है, जो कि चिंताजनक है।