पिछले लगभग दो दशकों से भारत विश्व में तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्थाओं में शुमार रहा है। विकासशील देशों की तरक्की में शहरी विकास के साथ ग्रामीण इलाकों की संपन्नता का भी बड़ा योगदान रहता है और इसके कुछ उदाहरण भारत में भी मिलते हैं।
लेकिन क्या आप जानते हैं कि आमदनी में बढ़ोत्तरी के साथ ही कर्जे भी बढ़े हैं? सरकारी संस्था नेशनल सैंपल सर्वे यानी एनएसएसओ के ताजा आंकड़ों के मुताबिक चाहे शहर हों या ग्रामीण इलाके, ज्यादा लोगों ने कर्ज लेना शुरू कर दिया है।
एनएसएसओ के ताजा आंकड़ों में खुलासा
एनएसएसओ के नए आंकड़ों के अनुसार भारत के ग्रामीण इलाकों में एक तिहाई और शहरों में एक चौथाई लोग ऋण में डूबे हैं। हर दशक होने वाले इस सरकारी सर्वेक्षण में पाया गया कि 2002 और 2012 के बीच शहरी परिवारों में औसतन कर्ज सात गुना बढ़ा जबकि ग्रामीण परिवारों में इसमें चार गुना इजाफा दिखा।
यानी सर्वे की मानें तो करीब 22% शहरी परिवार कर्ज में हैं और प्रति परिवार औसत 84,625 रुपए कर्ज निकलता है । जबकि ग्रामीण परिवारों में 31% कर्ज में डूबे हुए हैं और 2002 के 7,539 रुपए के औसत कर्ज की तुलना में 2012 में यह आंकड़ा 32,522 रुपए तक पहुंच चुका है।
ईएमआई बन गया फैशन
आर्थिक विश्लेषक परंजोय गुहा ठाकुरता को लगता है कि अगर इसमें दैनिक उपभोग की चीजें शामिल कर दें तो कर्ज कई गुना बढ़ जाएगा। उन्होंने कहा, "आज की पीढ़ी के लिए लोन या ईएमआई एक फैशन सा हो गया है क्योंकि विज्ञापनों के जरिये उन्हें आसानी से ऋण भी मिल सकता है और अपनी पसंद की वस्तु भी।"
वे कहते हैं, "25 साल पहले लोगों ने ईएमआई शब्द ही नहीं सुना था। लेकिन एक अहम बात यह भी है कि आमतौर पर ऋण उन्हीं को मिल पाता है जिनके पास गिरवी रखने के लिए कुछ हो। यानी गरीब और अमीरों के बीच की दूरी भी बढ़ रही है।
अच्छे जीवन की चाहत
एनएसएसओ ने सर्वे के लिए एक लाख से ज्यादा लोगों के घरों में दो बार जाकर यह जानकारी जुटाई। पर कुछ विश्लेषक मानते हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था परिपक्वता की ओर बढ़ रही है और उसमें थोड़ा कर्ज जरूरी है।
बैंक ऑफ बड़ौदा के पूर्व कार्यकारी निदेशक आरके बक्शी कहते हैं, "कर्ज बढ़ने के तीन प्रमुख कारणों में पहला यह है कि बैंकों के चलते लोगों में कर्ज ले पाने की जागरूकता बढ़ी है।"
"दूसरे, लोगों में अच्छा जीवन बिताने की चाहत आई है और तीसरा, भारत में संस्थाओं के जरिए ऋण की उपलब्धता में बहुत बदलाव आए हैं।"
बढ़ेगी कर्जदारों की संख्या !
हालांकि इस सर्वेक्षण ने मूलत: जमीन/घर या व्यवसाय के ऋण को मापदंड बनाया है। जानकारों के मुताबिक अगर भारत में हर तरह के ऋण को इस दायरे में लाएं तो कर्जदारों की संख्या कहीं ज्यादा होगी।
आरके बक्शी के अनुसार फिलहाल हालात इशारा करते हैं कि भारत की आर्थिक प्रगति की रफ्तार काफी सधी हुई है। हालांकि गौर करने वाली बात यह है कि सर्वेक्षण में इसका भी पता चला कि जिनके पास जायदाद का मालिकाना हक है उनके बीच के आर्थिक फासले काफी ज्यादा हैं।