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पाकिस्तानी बहू को नसीब हुई हिंदुस्तानी मिट्टी

Fri, 26 Dec 2014 08:04 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, मुरादाबाद
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कोहनियों तक जुड़े हाथ और झुर्रियों से ढके चेहरे पर आंखों से टपकते आंसू.. भर्राई हुई आवाज और बस एक ही फरियाद.... ‘मुझे मेरी माटी में दफन होने की इजाजत दे दो’।.. यूं तो इस वाकये को पूरे चार साल और 21 दिन बीत चुके हैं। लेकिन लगता है कल ही की बात है। पाकिस्तानी में ब्याही और मुरादाबाद में जन्मी 85 साल की खुर्शीद बानो ने तब हिंदुस्तान की सरकार से ये फरियाद की थी।
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लेकिन दोनों मुल्कों के बीच के तल्ख रिश्ते और वीजा कानून उनकी ख्वाहिश के दरमियान चट्टान की तरह खड़े थे। सरकार ने उनकी अर्जी नामंजूर कर दी थी। खुफिया एजेंसियों ने खुर्शीद से वापस अपने मुल्क पाकिस्तान लौटने का तकादा शुरू कर दिया था। ऐसे हालात में अमर उजाला ने खुर्शीद की गुहार को शब्द दिए तो मुरादाबाद की बेटी की मार्मिक गुहार दिल्ली में बैठे हुक्मरानों तक पहुंची। लंबी जद्दोजहद हुई, कानून के पन्ने पलटे गए।

आखिरकार सरकार झुकी और बतौर स्पेशल केस खुर्शीद बानो को आजन्म एलटीवी पर मुरादाबाद में रहने की इजाजत दे दी गई थी। तभी से वो मुरादाबाद में थीं। गुरुवार को दोपहर करीब एक बजे खुर्शीद दुनिया से रुखसत हो गईं और उन्हें उसी कब्रिस्तान में दफना दिया गया जहां उनके वालिद और बहनें दफन हैं।
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बंटवारे के बाद खुर्शीद हुईं पाकिस्तानी

वो मुरादाबाद शहर में जन्मी थीं, इन्हीं गलियों में खेली और पली बढ़ी थीं। उनका जन्म मुरादाबाद की बंजारों वाली गली में वर्ष 1928 में शिक्षक इज्जहतुल्ला के घर हुआ था। ये मुल्क के बंटवारे से पहले की बात है उनका निकाह भोपाल के महजर उल हक से हुआ, जो बंटवारे के वक्त पाकिस्तान के पेशावर में जा बसे। तब से खुर्शीद पाकिस्तानी हो गईं। बंटवारे के वक्त जब सरहदें खिंचीं और वो उस पार गईं तो गोद में एक बेटी नाज भी थी।

बाद में खुर्शीद का परिवार करांची के नाजमाबाद में शिफ्ट हो गया। लेकिन मिट्टी की कसक खुर्शीद को खींचती थी। लिहाजा उन्होंने बड़ी बेटी नाज का निकाह 1970 में मुरादाबाद में डिप्टीगंज में अपनी सगी बहन रईसी बेगम के बेटे राशिदउद्दीन के साथ किया। ताकि जन्म देने वाले मुल्क से तार जुड़ा रहा। खुर्शीद ने बाकी बेटियों का निकाह पाकिस्तान में ही किया। बेटियां ब्याह कर ससुराल जा चुकी थीं। बेटा डा. शमशुल हक डाक्टरी करने के बाद अमेरिका के रिचर्डसन में जा बसा। बहू भी डाक्टर है और अमेरिका में रहती है। ऐसे में खुर्शीद अकेली पड़ीं तो वतन की माटी की कसक और भी बढ़ गई।

जून 2010 में उन्होंने हिंदुस्तान का रुख किया और बड़ी बेटी नाज हक के साथ डिप्टी गंज में रहने लगीं। लेकिन वीजा चंद महीनों का था, पूरा हुआ तो खुफिया एजेंसियों ने चार दिसंबर 2010 को नोटिस दे दिया, वापस लौट जाओ नहीं तो जबरन भेज देंगे। अमर उजाला ने खुर्शीद की जंग लड़ी थी और 21 दिसंबर को सरकार ने खुर्शीद को हिंदुस्तान में रहने के लिए दया का पात्र मानते हुए उन्हें ताउम्र एलटीवी दे दिया था। गुरुवार को दोपहर एक बजे खुर्शीद की आंखें बंद हो गईं।
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