विदेश में बेकार पड़े टायरों के आयात में बढ़ोतरी से टायर मैन्यूफैक्चिरंग के घरेलू उद्योग पर विपरीत असर पड़ रहा है। टायरों के आयात बढ़ने से घरेलू स्तर पर बनने वाले टायरों की मांग कम हो गई है और इससे टायर निर्माण से जुड़ी इकाइयां अपनी क्षमता से कम स्तर पर उत्पादन कर रही हैं। इस मामले में ऑटोमोटिव टायर मैन्यूफैक्चरर्स एसोसिएशन (एटीएमए) ने वाणिज्य व उद्योग मंत्रालय से अपनी चिंता जाहिर की है।
एसोसिएशन के मुताबिक पिछले दो साल में घरेलू स्तर पर ट्रक व बस के रेडियल टायरों की उत्पादन क्षमता में भारी विस्तार किया गया और इस दिशा में 1,500 करोड़ रुपये का निवेश किया गया। एसोसिएशन का कहना है कि टायर उद्योग को लगाने में भारी पूंजी की आवश्यकता होती है। आयात में बढ़ोतरी से पूंजी के नुकसान के साथ बेरोजगारी भी बढ़ रही है।
एसोसिएशन के चेयरमैन रघुपति सिंघानिया के मुताबिक ये सारी चीजें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मेक इन इंडिया नारे के खिलाफ जा ही हैं। सिंघानिया के मुताबिक आयातित टायर की कीमतें काफी कम हैं, यहां तक कि कच्चे माल की कीमतों से भी कम। इससे घरेलू टायर उद्योग को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है।
एसोसिएशन का आरोप है कि चीन अपने देश के अतिरिक्त उत्पादित टायरों को भारत में डंप कर रहा है। चीन अपनी घरेलू मांग के मुकाबले काफी अधिक संख्या में टायरों का निर्माण करता है और अतिरिक्त सभी टायरों को वह भारत में भेज रहा है। आयातित टायरों में चीन की हिस्सेदारी सबसे अधिक है।