एक ओर जहां आयकर हटाने की मांग जोर पकड़ रही है, वहीं सरकार ने आयकर देने वालों को खाद्य सुरक्षा से वंचित करने का इंतजाम कर लिया है।
चुनावी गेम चेंजर के तौर पर लाए गए खाद्य सुरक्षा कानून में लाभार्थियों की पहचान का जिम्मा राज्य सरकारों को दिया गया है। लेकिन उत्तराखंड सहित कई राज्यों ने आयकर देने वालों को लाभार्थियों की सूची से बाहर रखने का फैसला किया है। इसके लिए वित्त मंत्रालय ने भी राज्यों को आयकर दाताओं के नाम और पते उपलब्ध कराने का फैसला किया है।
वित्त मंत्रालय के राजस्व विभाग ने इस बारे में गत 6 जनवरी का एक अधिसूचना जारी की है। अधिसूचना के मुताबिक करदाताओं से जुड़ी जानकारी राज्यों में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून को लागू करने वाले सचिव स्तर के अधिकारी को ही दी जाएगी। इस तरह की जानकारी मुहैया कराने के लिए केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) ने डायरेक्ट जनरल ऑफ इनकम टैक्स (सिस्टम) को अधिकृत किया है।
आयकर कानून के तहत करदाताओं से जुड़ी जानकारी को गोपनीय रखा गया है। यहां तक कि सूचना के अधिकार के तहत भी यह जानकारियों नहीं दी जाती हैं। सरकार विशेष परिस्थितियों में ही आयकर दाताओं से जुड़ी सूचनाओं का इस्तेमाल करती है।
आयकर डेटा की संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए राज्यों के खाद्य एवं रसद विभाग के सचिव स्तर के अधिकार को ही इस प्रकार की जानकारी उपलब्ध कराई जाएगी। इस बारे में सीबीडीटी की ओर से जारी आदेश के मुताबिक, डेटा की गोपनीयता सुनिश्चित करने के लिए राज्य सरकार और आयकर विभाग के बीच एक एमओयू साईन होगा। इसके बाद ही करदाता के नाम, पिता का नाम और पते की जानकारी राज्य सरकार को मिल सकेगी।
उल्लेखनीय है कि खाद्य सुरक्षा कानून में 50 फीसदी शहरी और 75 फीसदी ग्रामीण आबादी को 2 रुपये किलो की दर से गेहूं और 3 रुपये किलो की दर से चावल देने का प्रावधान किया गया है। राज्य सरकारें इसके लिए लाभार्थियों की पहचान करने में जुटी हैं।