देश में 2020 तक स्वास्थ्य बीमा उद्योग 250 अरब डॉलर का हो जाएगा। उद्योग संगठन फिक्की की ओर से हाल ही में स्वास्थ्य बीमा पर जारी एक रिपोर्ट में यह जानकारी सामने आई है। अपनी रिपोर्ट में फिक्की ने कंपनियों को स्वास्थ्य बीमा के क्षेत्र में नई रणनीति बनाने की बात कही है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि बीमा कंपनियां अपने स्वास्थ्य बीमा उत्पादों को गरीबों और वरिष्ठ नागरिकों को ध्यान में रखकर बनाएं। इसके साथ ही उद्योग को बढ़ावा देने के लिए सरकार, कंपनी और ग्राहक के बीच नैतिक और पारदर्शी प्रक्रिया अपनाया जाना आवश्यक है।
बीमा विनियामक एवं विकास प्राधिकरण (इरडा) के नए नियमों से गंभीर बीमारियां होने पर भी उपभोक्ता को स्वास्थ्य बीमा मिल सकेगा। वहीं, मानक स्वास्थ्य बीमा शर्तों और कंपनियों के बीच समझौतों को लेकर भी स्पष्टता आएगी। साथ ही क्लेम देने में कम समय लगेगा। कंपनियों को इससे जहां उपभोक्ता का विश्वास हासिल करने में मदद मिलेगी, वहीं धोखाधड़ी के मामले भी कम होंगे।
भारत सरकार को क्लीनिकल स्थापना अधिनियम 2010 और राष्ट्रीय मानक उपचार दिशानिर्देश से सेवाओं में गुणवत्ता बढ़ेगी। राज्य सरकारों को भी इस दिशा में काम करने की जरूरत है। रिपोर्ट के मुताबिक शिक्षा और उपभोक्ताओं के बीच जागरूकता से स्वास्थ्य बीमा के क्षेत्र में नई शुरुआत होगी।
स्वास्थ्य बीमा के बारे में जागरूकता पैदा करना महत्वपूर्ण चुनौती है। सरकार और बीमा उद्योग को पारदर्शिता के बारे में नए सिरे से सोचने की जरूरत है। बीमा उद्योग के लिए सरकार को करों में छूट दी जानी चाहिए। एक लाख रुपये के समूह स्वास्थ्य बीमा और नियोक्ता द्वारा भुगतान किए गए प्रीमियम पर कर कटौती की अनुमति मिलनी चाहिए।
उपभोक्ता के लिए प्रीमियम को कम करने के लिए स्वास्थ्य बीमा प्रीमियम पर सेवा कर रिफंड की सिफारिश भी फिक्की ने की। न्यूनतम वैकल्पिक कर (मैट) से स्वास्थ्य बीमा कंपनियों को छूट दी जानी चाहिए। फिक्की ने अपनी रिपोर्ट में जीवन बीमा कंपनियों की तरह वित्त अधिनियम 2012 के तहत भी मैट में छूट दिए जाने की मांग की। इस तरह की छूट से स्वास्थ्य बीमा कंपनियों को प्रोत्साहन मिलेगा और अधिक से अधिक लोगों तक बीमा का लाभ पहुंच पाएगा।