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ऊर्जा क्षेत्र में 1.2 लाख करोड़ रुपये का निवेश बचाने की कोशिश

Fri, 28 Nov 2014 09:12 AM IST
नई दिल्ली /सुजय मेहदूदिया
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मोदी सरकार ने कबाड़ में तब्दील हो रहे 24,000 मेगावाट के गैस आधारित बिजली संयंत्रों में 1.2 लाख करोड़ रुपये के निवेश को बचाने के लिए कमर कस ली है।
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सरकार अपनी नई रणनीति के तहत इन संयंत्रों को न केवल वित्तीय सहायता पैकेज उपलब्ध कराएगी बल्कि गैस प्राइस पुलिंग प्रणाली के जरिए इनसे उत्पादित बिजली की दरें 5.50 रुपये प्रति यूनिट पर रखने के लिए राष्ट्रीय स्वच्छ ऊर्जा कोष का भी इस्तेमाल कर सकती है।

जल्द ही इस प्रस्ताव को मंजूरी के लिए कैबिनेट में पेश किया जा सकता है। इस प्रणाली के जरिए सरकार न केवल अटके पड़े गैस आधारित बिजली संयंत्रों को शुरू करने के कदम उठाएगी बल्कि पीक आवर में ग्रिड को स्थिर बनाए रखने के लिए बिजली की अधिक उपलब्धता सुनिश्चित करेगी।
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राज्य वितरण कंपनियों को इन परियोजनाओं की व्यावहारिकता बनाए रखने के लिए निर्धारित दरों में बिजली खरीदने को भी कहा जाएगा।

गैस आधारित बिजली संयंत्रों के लिए ऊर्जा और तेल मंत्रालय ने राहत पैकेज का साझा मसौदा तैयार किया है। मसौदे में गैस पुलिंग प्रणाली के जरिए उत्पादन को स्थिर बनाए रखने के लिए राष्ट्रीय स्वच्छ ऊर्जा कोष का इस्तेमाल कर इन संयंत्रों से उत्पादित बिजली की दर 5.50 रुपये यूनिट पर निर्धारित करने जैसे उपाय किए गए हैं।

मसौदे में गेल और आरजीटीआईएल जैसी सरकारी पाइपलाइन ऑपरेटर कंपनियों को भी परिवहन दरें 20 फीसदी घटाने का सुझाव भी शामिल है।

इस मामले से जुड़े सभी हितधारकों से परामर्श करने के बाद सरकार इस मसले को बहुत जल्द कैबिनेट में लाएगी। इसके अलावा, मसौदे में नीलाम गैस क्षेत्रों से उत्पादित अतिरिक्त गैस के आवंटन में बिजली क्षेत्रों को 2018-19 तक प्राथमिकता देने का प्रावधान भी शामिल किया गया है।

गैस आधारित यह बिजली संयंत्र घरेलू प्राकृतिक गैस उत्पादन में निरंतर कमी के चलते ठप पड़े हैं। गैस प्राइस पुलिंग में घरेलू गैस और आयातित एलएनजी (जिसकी कीमत प्राकृतिक गैस तीन गुनी है) दोनों का मिश्रित मूल्य शामिल होगा और बिजली संयंत्रों को उचित कीमत पर गैस उपलब्ध कराई जाएगी।

जिससे कि कम से कम इन संयंत्रों का परिचालन होता रहे और यह राष्ट्रीय ग्रिड में 15 फीसदी अधिक बिजली का योगदान कर सकें। सरकारी बिजली कंपनियों के लिए आयातित गैस का इस्तेमाल कर बिजली का उत्पादन करना वहन करने योग्य नहीं रह गया है, जिसके चलते बिजली संयंत्र बेकार हो रहे हैं।

प्राइस पुलिंग से गैस की लागत कम होने की उम्मीद है। उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और दक्षिण भारत के प्रमुख क्षेत्र बिजली की कटौती और कमी से जूझ रहे हैं। इन राज्यों को आपूर्ति बढ़ाए जाने की सख्त जरूरत है।

निजी बिजली उत्पादक कंपनियों के संगठन एसोसिएशन ऑफ पावर प्रोड्यूसर्स के मुताबिक गैस की कमी के जरिए ग्रिड से जुड़े 24,149 मेगावाट क्षमता के गैस आधारित बिजली संयंत्र, जिनमें करीब 1.2 लाख करोड़ रुपये का निवेश हुआ है, कबाड़ में तब्दील हो रहे हैं। इस तरह के करीब 16,000 मेगावाट के प्रोजेक्ट में 64,000 करोड़ रुपये के निवेश की रफ्तार धीमी है।

बेकार पड़े इन बड़े बिजली संयंत्रों को शुरू करने का एक व्यावहारिक विकल्प तलाशने के लिए पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान और बिजली एवं कोयला मंत्री पीयूष गोयल एकसाथ आए हैं। इसमें स्टील मंत्रालय भी अपना सहयोग दे रहा है

इन परियोजनाओं के शुरू होने से इन्हें चलाने योग्य बनाया जा सकेगा और यह कंपनियां बैंकों को अपने कर्ज का भुगतान भी शुरू कर देंगी। बैंकों की भारी-भरकम राशि इन परियोजनाओं में अटकी पड़ी है। 
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बुधवार रात एक बैठक के बाद ऊर्जा मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि पूरा बिजली सेक्टर जिन मुश्किलों से जूझ रहा है, उस पर हमने चर्चा की। बिजली की कमी वाले क्षेत्रों में पर्याप्त बिजली उपलब्ध कराने के लिए हम एक ठोस योजना पर काम कर रहे हैं। इसके साथ ही हमारी कोशिश नीतिगत उपायों के जरिए बिजली की लागत को कम रखने की भी है।
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