सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में सरकार की हिस्सेदारी और घटेगी। मोदी सरकार ने इन बैंकों में सरकार की अंशधारिता को 52 फीसदी तक घटाने का मन बनाया है। यदि ऐसा होता है तो सरकार की झोली में करीब 90 हजार करोड़ रुपये की अतिरिक्त रकम आएगी।
वित्त मंत्रालय में राज्य मंत्री जयंत सिन्हा ने शुक्रवार को लोकसभा में एक लिखित उत्तर में यह जानकारी दी। उसमें बताया गया कि शेयरों की बिक्री से मिली राशि बैंकों की पूंजीकरण को बढ़ाने में काम आएगी।
इस समय सार्वजनिक क्षेत्र के 24 बैंकों में सरकार की हिस्सेदारी 56 से 84 फीसदी के बीच है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बैंकिंग क्षेत्र में पालन हो रहे नियमों के अनुरूप भारत के सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को भी सक्षम बनाने के लिए आगामी चार वर्षों के दौरान इसमें करीब 3,700 अरब रुपये के निवेश की जरूरत है। उल्लेखनीय तथ्य यह है कि इन बैंकों की गैर निष्पादित परिसंपत्ति में भी तेज वृद्धि हो रही है। इसलिए भी बैंकों को नए कारोबार के लिए ज्यादा रकम की जरूरत है।
पिछले कुछ दशकों के दौरान सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में सरकार करीब 800 अरब रुपये का निवेश कर चुकी है। लेकिन अब इन बैंकों में निवेश की मात्रा घट गई है क्योंकि घाटे को अंकुश में रखने के लिए सरकार खर्च और निवेश में कटौती कर रही है।
जयंत सिन्हा का कहना है कि सरकारी बैंकों में विनिवेश से इनमें जो राशि आएगी, उसका इस्तेमाल इन्हीं बैंकों में पूंजी डालने में हो सकेगी। इससे बजट पर ज्यादा जोर भी नहीं पड़ेगा और काम भी हो जाएगा।
सरकार की इस घोषणा के बाद शेयर बाजारों में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के शेयरों के दाम में उल्लेखनीय उछाल देखा गया। देश के सबसे बड़े बैंक एसबीआई के शेयर 5.3 फीसदी चढ़ गए जबकि बैंक आफ बड़ौदा के शेयरों में 8.3 फीसदी का उछाल दर्ज किया गया। बैंकेक्स में भी 5.8 फीसदी का उछाल आया जो कि पिछले तीन वर्षों का उच्चतम स्तर बताया जाता है।