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टैक्स कानूनों में स्पष्टता लाए सरकार

Sat, 16 Feb 2013 06:48 PM IST
नई दिल्ली/नैना लाल किदवई
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आम बजट 2013-14 कुछ ही दिनों में हमारे सामने होगा। आगामी बजट में अमीरों पर टैक्स का भार बढ़ाने और विरासत टैक्स लगाने के प्रस्ताव के बारे में चारों ओर बहस व चर्चा जोरशोर से हो रही है।
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उद्योग मंडल फिक्की अमीरों पर अधिक टैक्स लगाने के प्रस्ताव का पुरजोर विरोध करता है। हमारा मानना है कि सरकार के इस कदम से सेविंग और एंटरप्रेन्योरशिप हतोत्साहित होगा। इसलिए, देखा जाए तो ऐसी किसी भी तरह की नीति बनाना और उसे प्रभावी करना सरकार के हित में नहीं रहेगा। इससे केवल ईमानदार और समय पर कर की अदायगी करने वाले करदाताओं पर बोझ बढ़ेगा।

हमारा मानना है कि सरकार को अधिक से अधिक लोगों को टैक्स के दायरे में लाकर टैक्स आधार बढ़ाने के रास्ते तलाशने चाहिए। सरकार को अपनी मशक्कत केवल मौजूदा टैक्स दरों में ही हेरफेर करने तक सीमित नहीं रखनी चाहिए। क्योंकि, किसी भी नकारात्मक नीति का उद्योग और निवेश पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। ऐसे में एक स्थिर टैक्स प्रणाली को विकसित किए जाने की आवश्यकता है।
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देश में मुकदमेबाजी की लंबी प्रक्रिया से हममें से अधिकांश करदाता व्यथित और निराश हैं। भारत में एक मुकदमे के सुप्रीम कोर्ट पहुंचने और उस पर अंतिम फैसला आने में सामान्यत: 10-15 साल का समय लग जाता है।
समस्याएं उस समय और बढ़ जाती हैं, जब आयकर विभाग की ओर से टैक्स का निर्धारण हस्तांतरित करने के विवाद सामने आते हैं। इसकी मुख्य वजह है कानून अपनी प्रारंभिक स्थिति में है और सरकार की ओर से पर्याप्त दिशानिर्देश व जरूरी कागजातों को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है।

इस स्थिति में करदाता के पास कोई विकल्प नहीं बचता है और वह अपील-दर-अपील की प्रक्रिया में फंस जाता है। इन हालातों में कर प्रशासन और न्यायिक प्रक्रिया में सुधार की तत्काल आवश्यकता है। सरकार को मुकदमेबाजी की लंबी प्रक्रिया के समाधान की प्रणाली को बेहतर बनाने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।

फिक्की ने अपने बजट पूर्व ज्ञापन में विवादों का निपटारा करने की प्रक्रिया में सुधार लाने के कुछ सुझाव दिए हैं। इसमें कर अधिकारियों के स्तर पर उचित जवाबदेही तय करना प्रमुखता से शामिल है। इसके साथ ही सरकार को अंतरराष्ट्रीय कराधान के मामलों में कर अधिकारियों की क्षमता बेहतर बनाने और इन मसलों पर उचित मार्गदर्शन के लिए विशेषज्ञों का एक केंद्रीय पूल बनाना चाहिए।

अप्रत्यक्ष करों के संबंध में फिक्की की प्रमुख सिफारिशों में विवादित मामलों की न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने की वैधानिक समय सीमा तय करना व राजस्व संबंधी पूर्वाग्रहों से बचने के लिए टैक्स आकलन के कार्यों से न्यायिक कार्यों को अलग करना आदि शामिल है। हमारा मानना है कि यदि सरकार इन उपायों पर गौर करती है और इन्हें प्रभावी बनाने की दिशा में कदम बढ़ाती है, तो देश में बड़ी संख्या में लंबित मुकदमों की संख्या कम करने में मदद मिलेगी।

व्यक्तिगत कराधान को लेकर पर हमारा सुझाव है कि आगामी बजट में 20 लाख रुपये से अधिक की आमदनी पर ही अधिकतम 30 फीसदी का टैक्स स्लैब लागू किया जाना चाहिए। वेतनभोगी कर्मचारियों के लिए आयकर नियमों में 50 हजार रुपये के स्टैंडर्ड कटौती की सुविधा के साथ धारा 80सी के तहत कर छूट की सीमा बढ़ाकर 2 लाख रुपये और हाउसिंग लोन के ब्याज पर कर कटौती की सीमा को बढ़ाकर 2.5 लाख रुपये कर देनी चाहिए।

हमें पूरा भरोसा है कि जब वित्त मंत्री आम बजट 2013-14 की घोषणा करेंगे, तो वह कर कानूनों में पारदर्शिता लाने, एक स्थिर कर प्रणाली बनाने, सहज कर प्रशासन और विवादों के निपटान के लिए बेहतर व्यवस्था विकसित करने के अपने वादों को पूरा करेंगे।
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नैना लाल किदवई फिक्की की प्रेसिडेंट हैं।
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