कभी चीनी और वनस्पति तेल से जुड़े उद्योगों की किस्मत तय करने वाले शर्करा और वनस्पति एवं खाद्य तेल निदेशालय का स्वतंत्र वजूद खत्म हो गया है। न्यूनतम सरकार, अधिकतम शासन के मूलमंत्र पर काम कर रही मोदी सरकार ने खाद्य मंत्रालय के तहत आने वाले शर्करा निदेशालय और वनस्पति व खाद्य तेल निदेशायल के विलय का फैसला किया है। पिछले साल चीनी उद्योग के आशिंक तौर पर नियंत्रण मुक्त होने के बाद शर्करा निदेशालय की भूमिका सीमित हो गई थी। जबकि वनस्पति एवं खाद्य तेल निदेशालय की अहमियत ९० के दशक में ही कम होने लगी थी। नए बने शर्करा एवं वनस्पति तेल निदेशालय में कुल ७५ पद रखे गए हैं, जो चार विंग में बंटे हैं।
खाद्य एवं उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय की ओर से जारी अधिसूचना के मुताबिक, विलय के बाद शर्करा एवं वनस्पति तेल निदेशालय नाम का एक नाय कार्यालय बनाया जाएगा। अब चीनी और खाद्य तेलों से जुड़ी नीतियां, योजनाएं और कानून इसी निदेशालय के जरिए लागू होंगे। गौरतलब है कि दोनों निदेशालयों को उदारीकरण से पहले काफी अधिकार मिले हुए थे। चीनी के उत्पादन से लेकर, स्टॉक्स, लेवी और खुले बाजार में बिक्री से जुड़े नियम-कायदों को लागू करने में शर्करा निदेशालय की अहम भूमिका रहती थी। वनस्पति एवं खाद्य तेल निदेशायल की अहमियत भी वर्ष १९९२ में खाद्य तेलों के आयात-निर्यात की छूट (ओपन एंड जनरल लाइसेंस) मिलने के बाद से ही घटने लगी थी। अब इनकी भूमिका सिर्फ उत्पादन के आंकड़े जुटाने और संबंधित क्षेत्र के उद्योगों के लिए चलाई जा रही सरकारी योजनाओं की निगरानी तक सीमित रह गई थी।