सोना सदा के लिए है। सोने के प्रति दीवानगी का ही असर है कि शादी ब्याह हो या निवेश, भारतीय जनता सोने को ज्यादा तवज्जो देती रही है। लेकिन पिछले एक दशक के आंकड़ों पर गौर करें तो कुछ चौंकाने वाली बातें सामने आई है। आइए जानते हैं निवेश को लेकर भारतीय जनता की नजर किस चीज पर ज्यादा टिकती है।
लगातार बढ़ती कीमतों के बावजूद ग्रामीण उपभोक्ता की दीवानगी सोने को लेकर बढ़ी है। ग्रामीण अपनी आय का एक बड़ा हिस्सा सोना खरीदने में खर्च कर रहा है। जबकि शहरी वर्ग कार जैसी मदों पर खर्च कर रहा है। घर जायदाद पर खर्च करने का प्रतिशत एकाएक घटा है। एनएसएसओ (NSSO) की रिपोर्ट से पता चलता है कि भारतीय उपभोक्ता के किस वर्ग ने पिछले एक दशक में किस मद पर ज्यादा खर्च किया।
शेयर या फंड नहीं, केवल सोना
रिपोर्ट बताती है कि ग्रामीण क्षेत्र के लोगों ने 2004-05 में अपनी आय का 13.8 फीसदी धन सोने की खरीद में खर्च किया। 2011-12 ग्रामीण जनता अपनी आय का 23.6 फीसदी हिस्सा सोने की खरीद पर लगा रही है।
दूसरी तरफ शहरी जनता 2004-05 में अपनी आय का 11.5 फीसदी हिस्सा सोने की खरीद पर खर्च करती थी और 2011-12 में यह फीसदी 19.9 तक बढा। कुल मिलाकर पिछले एक दशक में ग्रामीण जनता ने सोने खरीदने के मामले में शहरियों को पीछे छोड़ दिया।
इसका कारण माना जा रहा है कि एक तरफ जहां शहरी सोने के अलावा ट्रेंडी ज्वैलरी अपना रहे हैं, ग्रामीण जनता अभी भी सोने के गहनों पर विश्वास करती है। दूसरी और खास बात है कि जहां शहरी तबके ने शेयर, बॉन्ड, फंड जैसे निवेश माध्यमों को अपनाया है, ग्रामीण जनता की नजर में अब भी सोना निवेश का सबसे बेहतर जरिया है।
घर खरीदने पर कौन करता है ज्यादा खर्च
2004-05 के आंकड़े देखें जाएं तो ग्रामीण जनता ने अपनी आय का 33.4 फीसदी हिस्सा खर्च किया और 2011-12 तक आते आते ये प्रतिशत 18.1 फीसदी पर सिमट गया।
कुछ यही हाल शहरी जनता का रहा। शहरी जनता ने 2004-05 में 20.9 हिस्सा खर्च किया और 2011-12 तक आते आते ये महज 11.4 रह गया।
विशेषज्ञ इसका एक कारण ये बता रहे हैं कि रियल एस्टेट में लगातार आए उतार चढ़ाव के चलते उपभोक्ता का ध्यान यहां से भटका है। 2008 में आई वैश्विक आर्थिक मंदी को भी इस गिर रहे आंकड़े के लिए जिम्मेदार माना जा सकता है।
किसको लगा लग्जरी गाड़ियों का शौक?
अब बात करते हैं वाहन पर होने वाले खर्च की। यहां चौंकाने वाले आंकड़े शहरी जनता की तरफ से ही मिले हैं। शहरी जनता पर एक दशक पहले भी कारों का जुनून था और अब भी है। शहरी जनता अपनी आय का एक बड़ा हिस्सा कार व अन्य वाहन खरीदने में लगा रही है। 2004-05 में जहां शहरी जनता अपनी आय का 67.6 फीसदी हिस्सा कार खरीदने में लगा रही थी, 2011-12 में ये बढ़कर 68.07 हो गया।
दूसरी तरफ ग्रामीण जनता की दिलचस्पी भी वाहनों के प्रति बढ़ी है। 2004-05 में ग्रामीण तबका अपनी आय का 52.8 फीसदी हिस्सा गाड़ी खरीदने पर लगाता था और 2011-12 में ये प्रतिशत बढ़कर 58.3 हो गया।
जानकार कहते हैं कि मेट्रो सिटी के विस्तार के कारण जब किसानों को मुआवजा मिला तो उन्होंने लक्जरी गाड़ियां खरीदी और लाइफ स्टाइल को अपडेट किया। ठीक उसी तरह से मार्डन लाइफस्टाइल के चलते शहरी तबका गाड़ी पर ज्यादा खर्च करता आ रहा है।