खाद्य सुरक्षा कानून लाकर वाहवाही लूटने की कोशिश में जुटी केंद्र सरकार के इंतजाम की पोल भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने खोल दी है।
कैग की हालिया रिपोर्ट में फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (एफसीआई) की भंडारण क्षमता, रखरखाव और न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करने की व्यवस्था पर कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं। कैग ने एफसीआई की कार्यप्रणाली और केंद्रीय पूल में अनाज के प्रबंधन में भी कई खामियां उजागर की हैं।
मंगलवार को संसद में पेश कैग की इस रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2006-07 से 2011-12 के बीच खाद्यान्न की सरकारी खरीद 343 लाख टन से बढ़कर 634 लाख टन पहुंच गई है। लेकिन, केंद्र सरकार और एफसीआई पर्याप्त भंडारण क्षमता जुटाने में नाकाम रहे हैं।
मार्च, 2012 में देश में करीब 332 लाख टन भंडारण क्षमता की कमी थी, जबकि केंद्र और एफसीआई द्वारा सिर्फ 34 लाख टन क्षमता के गोदामों का निर्माण ही पूरा हो सका। इन छह वर्षों में एफसीआई की भंडारण क्षमता 151 लाख टन से 156 लाख टन के करीब ही रही, जबकि केंद्रीय पूल में अनाज का भंडारण बढ़कर 824 लाख टन तक पहुंच गया।
कैग ने ऑडिट में न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करने की कोई निश्चित व्यवस्था न होने का मुद्दा भी उठाया है। कैग का कहना है कि गेहूं की उत्पादन लागत और एमएसपी के बीच गत वर्षों में 29 फीसदी से लेकर 66 फीसदी तक का अंतर देखा गया है, जबकि धान में यह अंतर 14 से 60 फीसदी के बीच रहा है।
किराए के गोदाम पर खर्च हुए हजार करोड़
पर्याप्त भंडारण क्षमता के अभाव में एफसीआई को किराए पर गोदाम लेने पड़ रहे हैं। कैग ने छह साल में किराए के गोदाम का सालाना खर्च 322 करोड़ रुपये से बढ़कर 1,119 करोड़ रुपये हो जाने को गंभीरता से लिया है। गोदामों की कमी के चलते एफसीआई राज्य सरकार की एजेंसियों द्वारा केंद्रीय पूल के लिए खरीदा अनाज समय पर नहीं उठा पा रही हैं। कैग ने एफसीआई आंतरिक ऑडिट व्यवस्था को भी नाकाफी बताया है।
केंद्रीय पूल की जवाबदेही तय नहीं
केंद्रीय पूल में अनाज के भंडारण और बफर स्टॉक से जुड़ी कई खामियां भी कैग ने उजागर की हैं। कैग का कहना है कि केंद्र सरकार की ओर से सुझाए गए बफर स्टॉक के मानकों में खाद्य सुरक्षा से जुड़े कई जरूरी पहलुओं का जिक्र नहीं है। केंद्रीय पूल के लिए अनाज के भंडारण का जिम्मा कई एजेंसियां संभालती हैं, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर किसकी जिम्मेदारी है, यह स्पष्ट नहीं है।