बतौर उपभोक्ता हम महंगाई, घटिया उत्पादों और सुविधाओं के साथ इस तरह की व्यापारिक गतिविधियों पर अंकुश की अपेक्षा रखते हैं। लोग खाना, घर स्वास्थ्य और शिक्षा को और सस्ता होते देखना चाहते हैं। लेकिन इस बजट में ऐसा कुछ भी देखने को नहीं मिला। महंगाई घटने का रास्ता नहीं दिखाया गया।
बजट में सामूहिक विकास और घाटे का जिक्र है और इससे निपटने के लिए पैसे की जरूरत है। सरकार निवेश के मोर्चे पर ज्यादातर प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और विदेशी निवेशकों निर्भर दिखती है लेकिन ये सही समाधान नहीं है। पेंशन, स्वास्थ्य सेवाओं और कर्ज घटाने जैसे सामाजिक सुरक्षा के मसलों पर उपभोक्ताओं की उम्मीदों के मुताबिक बजट में ऐलान नहीं किया गया है।
हालांकि चुनावों को देखते हुए महिलाओं, बच्चों, युवाओं, गरीबों के साथ एससी/एसटी के लिए कौशल विकास, शिक्षा, स्वास्त्य व रोजगरा से जुड़े कुछ ऐलान किए गए हैं। हमें बैंकिंग, बीमा, इंफ्रास्ट्रक्चर और अन्य तमाम क्षेत्रों में जिम्मेदार नियामकों की जरूरत है जो कि उपभोक्ता के हितों की रक्षा करें न कि सरकार और इंडस्ट्री के हित साधें पर इस बजट में न तो इस तरह का कोई प्रावधान किया और न ही इसका कोई संकेत दिया गया।
विदेश से आने वाला पैसा में सरकार और इंडस्ट्री के पास जाता दिखता है। हेल्थ सेक्टर के लिए आवंटित धन काफी कम है। बजट का असली असर इसके लागू होने के बाद दिखता है। उपभोक्ता के लिहाज से हमें छह महीने इंतजार करना होगा। इसके बाद ही पता चलेगा कि बजट में की गई घोषणाओं को किस तरह अमली जामा पहनाया गया और इसका नतीजा क्या रहा। साथ ही सरकार महंगाई को कैसे काबू में करती है।