वित्त मंत्री की तमाम कोशिशों के बावजूद चालू खाता घाटा (सीएडी) काबू में नहीं आ रहा है। मौजूदा वित्त वर्ष की तीसरी तिमाही में यह रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है।
गत दिसंबर में समाप्त तिमाही में यह घाटा सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 6.7 फीसदी रहा। जबकि इससे पहले साल की समान अवधि में चालू खाते का घाटा जीडीपी का 4.4 फीसदी था। इसी वित्त वर्ष में जुलाई-सितंबर के दौरान चालू खाता घाटा 5.4 फीसदी ही था।
बृहस्पतिवार को रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) की ओर से जारी आंकड़ों के अनुसार, गिरते निर्यात और पेट्रोलियम व सोने के अधिक आयात की वजह से चालू खाते का घाटा 32.63 अरब डॉलर तक पहुंच गया है।
अप्रैल-दिसंबर के दौरान चालू खाते का कुल घाटा 71.7 अरब डॉलर रहा है जबकि पिछले साल दिसंबर तक यह 56.5 अरब डॉलर था। तीसरी तिमाही में आयात 9.4 फीसदी बढ़ा जबकि निर्यात में सिर्फ 0.5 फीसदी का इजाफा हुआ। चालू खाता घाटा बढ़ने के बावजूद वित्तीय खाते का सरप्लस 24.2 अरब डॉलर से बढ़कर 31.1 अरब डॉलर हो गया है।
योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने चालू खाता घाटा बढ़ने के पीछे सोने के बढ़ते आयात को वजह माना है। उन्होंने अधिक घाटे को वहन करने के लिए नई वित्तीय रणनीति पर जोर दिया है। उधर, वित्त मंत्रालय का कहना है कि चालू खाते का घाटा ज्यादा है लेकिन आश्चर्यजनक नहीं।
आरबीआई और सरकार इस पर नजर रखें हुए हैं। जरूरत पड़ी तो इसे काबू में करने के लिए जरूरी कदम उठाए जाएंगे। मंत्रालय को उम्मीद है कि इस घाटे की भरपाई विदेशी निवेश से हो जाएगी। निर्यात में सुधार को देखते हुए आखिरी तिहाई में चालू खाता घाटा कुछ कम हो सकता है। उल्लेखनीय है कि गत फरवरी में मर्चेंडाइज एक्सपोर्ट लगातार दूसरे महीने बढ़ा है। सरकार इसे एक अच्छा संकेत मान रही है।
एफडीआई घटकर हुई आधी
एफडीआई को बढ़ावा देने की तमाम कोशिशों का कोई खास असर होता नहीं दिख रहा है। चालू वित्त वर्ष की तीसरी तिमाही में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश गत वर्ष 5 अरब डॉलर से घटकर 2.5 अरब डॉलर रह गया है। जबकि इसी अवधि में करीब 6.3 अरब डॉलर का निवेश भारत से निकाला गया।