आधुनिकता के इस दौर में भले ही यह अंधविश्वास लगे, लेकिन अनुभव कहते हैं कि इस जंगल पर जिंदा इंसानों का कोई हक नहीं है। इसके हर दरख्त, हर शाख यहां तक की इसकी घास फूस पर भी सिर्फ मुर्दों का ही अधिकार है। यहां की लकड़ी घर में इस्तेमाल करने के लिए नहीं है। जंगल के तीन ओर मरघट बने हैं जबकि एक ओर सोमभद्रा बह रही है। यह शहर-ए-खामोश का जंगल है।
जी हां, गगरेट के प्राचीनतम द्रोण शिवबाड़ी जंगल की लकड़ी को घर के चूल्हों में जलाना वर्जित है। यहां की लकड़ी को सिर्फ शव जलाने के लिए ही इस्तेमाल में लाया जा सकता है। लगभग पांच वर्ग किलोमीटर में फैला यह घना जंगल अपने आप में प्रकृति की अद्भुत रचना है।
इसके बीचोंबीच स्थित द्रोण शिव मंदिर से जंगल के बाहरी हिस्सों में बने मरघटों का फासला करीब सात-सात सौ मीटर है। द्रोण शिव मंदिर के पुजारी अजय शर्मा, अश्वनी शर्मा, ज्योतिषी अरविंद चक्रवर्ती, रमेश लौ, विकास शर्मा, संजीव कुमार, दिनेश शर्मा की मानें तो इस जंगल की लकड़ी को घर के चूल्हे में जलाना वर्जित है।
उन्होंने कहा कि इतिहास गवाह है कि जिस किसी ने भी यहां से लकड़ी अपने घर को ले जाने का प्रयास किया तो उसके साथ अनिष्ट ही हुआ। पुजारी अजय शर्मा बताते हैं कि प्राचीनतम द्रोण शिव मंदिर के प्रांगण में द्वापर युग में पांडव गुरु द्रोणाचार्य यहां पांडवों को धनुर्विद्या सिखाया करते थे।
एक सच यह भी
पुजारी अजय शर्मा और अश्वनी शर्मा की मानें तो करीब दो दशक पहले यहां सेना के नौ जवानों ने जंगल से लकड़ी काटी थी। लकड़ी की खेप को वे फौजी जिस ट्रक में ले जा रहे थे वह ट्रक करीब तीन किलोमीटर आगे जाकर दुर्घटनाग्रस्त हो गया था। इसमें ट्रक में सवार सभी जवान अल्पकाल मृत्यु को प्राप्त हुए। इसी तरह यहां से लकड़ी ले जाने वाले और भी कई लोगों के साथ हादसे हुए हैं।
मंदिर में आने-जाने का एक ही रास्ता
प्राचीनतम द्रोण शिव मंदिर में पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और देश के विभिन्न शहरों से श्रद्धालु आते हैं। घने जंगल में चिन्हित किए गए रास्ते से मंदिर तक जाने के बाद दर्शन करके श्रद्धालु उसी रास्ते से वापस लौटते हैं।