आमतौर मर्दों के बीच औरतों के कम दिमाग को लेकर कई मजाक चलते हैं। इस मजाक औरतें भले ही खीज भी जाती हों। लेकिन वैज्ञानिक तौर पर यह सच है कि पुरुषों की अपेक्षा औरतों का दिमाग छोटा होता है। हालांकि औरतों कम दिमाग का इस्तेमाल करके भी पुरुषों के बराबर और कभी कभी उनसे बेहतर रिजल्ट प्राप्त कर लेती हैं।
क्यों छोटा है औरतों का दिमाग
वैज्ञानिकों का कहना है कि औरतों का दिमाग आदमियों की तुलना में आठ फीसदी छोटा है। इसका कारण ये बताया गया है कि पुरुषों के पास ब्रेन सेल्स की तादाद ज्यादा है। जबकि महिलाओं के पास ब्रेन सेल्स की तादाद पुरुषों के मुकाबले कम है। ब्रेन सेल्स की उपलब्धता ही किसी व्यक्ति के दिमाग का साइज बता सकती हैं।
वैज्ञानिक अध्ययन में ये बात सामने आई है कि भले ही औरत-मर्द को मनोवैज्ञानिक रूप से अलग कर पाना अभी तक बहुत मुश्किल था लेकिन ब्रेन के आकार को लेकर दोनों के मनोविज्ञान के बारे में पता लगाया जा सकता है।
कम दिमाग में बेहतर करती हैं औरतें
लेकिन दिमाग के संबंध में ही दूसरा आकलन मर्दों को मायूस करने वाला है। यह कहता है कि भले ही औरतों का दिमाग मर्दों की तुलना में छोटा हो लेकिन औरतें मर्दों की अपेक्षा ज्यादा कुशलता से दिमाग का प्रयोग करती हैं।
इसका कारण ये है कि भले ही मर्दों के पास ब्रेन सेल्स का भंडार हो लेकिन औरतों के पास रीजनिंग और न्यूरॉन के बीच बेहतर कनेक्शन होता है। यानी कि दिमाग में कम सेल्स होने के बावजूद औरतें जल्द डिसीजन और बेहतर निर्णय क्षमता का परिचय देती हैं।
यूनिवर्सिटी ऑफ केलीफोर्निया के न्यूरोलॉजिस्ट टीम ने यह नया अध्ययन किया है जिससे औरतों को मायूसी के साथ साथ खुशी भी मिली है। इस टीम ने यह जानने की कोशिश की कि मर्दों की अपेक्षा छोटा दिमाग होने के बावजूद महिलाओं के भीतर उनके समान बुद्धिमत्ता कैसे है।
कम मिला ज्यादा दिया
डेली मेल के मुताबिक टीम ने दिमाग के उस हिस्से पर फोकस किया जिसे 'हिप्पोकैंपस' कहते हैं। यह हिस्सा जरूरी मैमोरी और भावों को संजो कर रखता है। पुरुषों के दिमाग का 'हिप्पोकैंपस' महिलाओँ की तुलना में ज्यादा बड़ा है। इसके साथ ही न्यूरल पॉवर भी ज्यादा है। जबकि महिलाओँ के दिमाग का ये हिस्सा छोटा होने के बावजूद अच्छी तरह से व्यवस्थित और बेहतर रिजल्ट देने वाला होता है।
इस टीम की प्रारंभिक सफलता से यह साबित हो चुका है कि महिलाएं कुदरती देन में कमी होने के बावजूद बेहतर रिजल्ट देती हैं जबकि पुरुष कुदरती मेहरबानी का पूर्ण उपयोग कर पाने में असफल रहे हैं।
हालांकि कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर ट्रेवर रोबिन्स का कहना है कि अध्ययन अभी जारी है और अंतिम निष्कर्ष दोनों ही वर्गों को आश्चयचकित कर सकता है।