आमतौर पर लोग चश्मा लगाने के सिरदर्द की शिकायत करते हैं। लेकिन अब एक ऐसा चश्मा ईजाद हो गया है जो सिरदर्द में आपके सिर की मसाज करेगा। दिखने में साधारण सा लगने वाला ये चश्मा बड़े कमाल का है और एक साथ कई काम निपटाता है।
लखीमपुर शहर के एक छात्र ने ऐसा चश्मा इजाद किया है, जो अंधेरे में टार्च की रोशनी देता है, गाने सुनाकर मनोरंजन करता है। यही नहीं मोबाइल पर आने वाली काल्स सुनने और जवाब देने में मदद करता है। महज एक बटन दबाने भर से समय बताता है। सिर में दर्द होने पर मसाज करके सुकून भी देता है। यह साधारण चश्मे जैसा ही दिखता है।
पं. दीनदयाल उपाध्याय सरस्वती विद्या मंदिर इंटर कॉलेज के 11वीं कक्षा के छात्र मयंक पांडे ने यह कारनामा कर दिखाया है। मयंक निघासन के अधिवक्ता सुबोध पांडे का बेटा है। उसने एक साधारण चश्मे को तमाम खूबियों वाले एक गैजेट में तब्दील कर दिया है। यह चश्मा अपने कान की डंडियों पर लगे सर्किट और ब्लू ट्रूथ डिवाइस के जरिए मोबाइल फोन से कनेक्ट हो जाता है। इसके बाद आप चश्मे की डंडियों पर लगे हेडफोन के जरिए न केवल काल सुन सकते हैं, बल्कि इससे टॉकिंग क्लाक के जरिए टाइम भी जान सकते हैं। यह चश्मा मेमोरी कार्ड पर पड़े गाने भी आपको सुनाएगा।
अंधेरे में कहीं जाने या कुछ पढ़ने के लिए रोशनी की जरूरत नहीं है। महज एक स्विच दबाने भर से इसके दोनों ओर लगे बल्व जलकर पर्याप्त रोशनी देते हैं। मयंक की इस उपलब्धि से न सिर्फ उसके माता-पिता, बल्कि उसके ताऊ देवकांत पांडे, ताई बीना पांडे, बड़ी बहन आयुषी समेत पूरा घर गर्व का अनुभव कर रहा है।
मयंक के स्कूल के प्रिंसिपल राजेश मिश्र और प्रवक्ता हरेराम पांडे इस होनहार छात्र की इस अनोखी ईजाद से खासे खुश हैं। उनका कहना है कि वह नेशनल इन्नोवेशन संस्था से संपर्क कर इस अविष्कार की जानकारी देंगे, ताकि छात्र को आगे और काम करने के लिए प्रोत्साहन मिले।
मयंक का कहना है कि उसे इस अविष्कार की प्रेरणा आमिर खान की फिल्म थ्री इडियट्स देखने के बाद मिली। मयंक बताता है कि मोबाइल को हेडफोन या ब्लू ट्रूथ के जरिए जोड़ने से तारों के झंझट के कारण काफी खराब लगता है। इसी वजह से उसने बिना तारों का जाल बदन पर फैलाए उसने इसे महीन तारों को चश्मे की डंडियों में छिपाकर बनाने का तरीका निकाला। इसमें लगा बाइब्रेटर सिरदर्द होने पर माथे की मसाज भी करता है। इन सभी कामों को करने के लिए चश्मे की डंडी पर छोटे-छोटे बटन लगे हैं।
इस चश्मे को बनाने में मयंक ने घर में खराब पड़े ब्लू ट्रूथ, डिवाइस, बच्चों के खिलौनों में लगने वाले सेलों आदि का उपयोग किया है। आगे चलकर वह इस चश्मे में जीपीएस सिस्टम को भी जोड़ने पर काम कर रहा है। ताकि यह चश्मा रास्ता भी बता सके। इन सारी खूबियों के बावजूद इस चश्मे का वजन भी ज्यादा नहीं है।