जिनके बच्चे नहीं होते उनके लिए आईवीएफ तकनीक वरदान की तरह है लेकिन ये तकनीक ऐसे बच्चों को मानसिक रूप से कमजोर भी बना सकती है।
इतना ही नहीं एक ही तरह की तकनीक से प्रजनन होने पर टि्वन्स या ट्रिपलेट्स में भी समान तरह का मानसिक विकार हो सकता है।
एक अध्ययन के मुताबिक इसका कारण आइवीएफ में इस्तेमाल होने वाली इंट्रा-साइटोप्लाजमिक स्पर्म इंजेक्शन (आईसीएसआई) तकनीक है।
आईसीएसआई उपचार के जरिए पैदा हुए बच्चों का आईक्यू लेवल कम होने या उनके ऑटिज्म से ग्रसित होने की आशंका अधिक होती है।
स्वीडन में हुए एक अध्ययन में यह बात सामने आई है। अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन में छपे इस अध्ययन में आईवीएफ तकनीक में इस्तेमाल में होने वाले उपचार के विभिन्न तरीकों से बच्चों की मानसिक क्षमता पर होने वाले असर को लेकर तुलना की गई है।
अध्ययन में पाया गया कि जब शुक्राणुओं को सीधे ही अंडाणु में प्रवेश कराया गया तो मानसिक विकार का खतरा 51 प्रतिशत तक बढ़ गया।
प्रजनन की आईसीएसआई तकनीक में शुक्राणु कम होने या उनके खराब होने की स्थिति में पुरूष के शुक्रणुओं को स्त्री के अंडाणु में प्रवेश कराया जाता है।
इस पूरी प्रक्रिया में खतरा उस समय और बढ़ जाता है जब टेस्टिकल्स से सर्जरी के जरिए शुक्राणु लिए जाते हैं। इससे बच्चे को ऑटिज्म होने का खतरा चार गुना तक बढ़ जाता है।