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धूप-दीप नहीं 'लाठी' से होती है देवी की पूजा

Mon, 08 Apr 2013 01:12 PM IST
हरिओम आर्य/मथुरा
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आप नवरात्र में देवी पूजन कैसे करते हैं। धूप दीप, नैवेद्य, फूलों की मात्रा और आरती का गान। लेकिन नरी सैमरी मंदिर की देवी की पूजा लाठियों और भालों से होती है। आप चौंक जरूर जाएंगे लेकिन यह सत्य है और सात सौ साल पुरानी परंपरा है।
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जी हां, मथुरा जनपद में स्थित नरी सैमरी मंदिर में साढ़े सात सौ साल पुरानी परंपरा का निर्वाह इसी तरह से यहां होता आया है। 11 अप्रैल से नवरात्र के साथ नरी सैमरी मेला आरंभ होगा। मेले में 19 अप्रैल को लट्ठ पूजा होगी। इस अनूठी लट्ठ पूजा के लिए तैयारियां आरंभ हो गई हैं।

चौमुंहा के गांव नरी सैमरी स्थित मंदिर में विराजमान देवी मां की लोग लट्ठों से पीटकर पूजा करते हैं। इस अनूठी, अकल्पनीय लट्ठ पूजा का साक्षी बनने के लिए श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ता है। इस बार लट्ठ पूजा चैत्र मास के शुक्लपक्ष की नवमी को यानि 19 अप्रैल को होगी।
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मान्यता है कि आगरा का ध्यानू (धांधू) भगत नगर कोट कांगडा हिमाचल प्रदेश वाली देवी मां का भक्त था। उसने काफी समय तक पूजा कर देवी मां को प्रसन्न किया। देवी ने भगत से वरदान मांगने को कहा। भगत ने मां से अपने साथ आगरा चलने का वरदान मांगा। देवी भगत के साथ आगरा जाने को राजी हो गईं लेकिन उन्होंने शर्त रखी कि वह रास्ते में पीछे मुड़कर नहीं देखेगा। जहां उसने पीछे मुड़कर देखा, देवी उसी स्थान पर विराजमान हो जाएंगी।

नगर कोट से देवी माता भगत के पीछे आगरा के लिए चल दीं। ब्रज में आकर भगत को शंका उत्पन्न हुई कि मां पीछे आ रही हैं या नहीं, उन्होंने पीछे मुड़कर देखा और देवी मां वहीं विराजमान हो गईं। यह जगह थी चौमुंहा का गांव नरी सैमरी। उस समय यहां काफी घना जंगल था। भगत ने क्षमा याचना की लेकिन देवी मां ने उसे दर्शन नहीं दिए। अंतत: भगत को निराश होकर आगरा लौटना पड़ा।

वर्षों बाद ग्रामीण अजीता सिंह को देवी मां ने स्वप्न दिया कि उनकी प्रतिमा जमीन में दबी है। देवी मां की प्रतिमा को निकाला गया। साढ़े सात सौ वर्ष पूर्व ग्रामीणों ने करीब 28 एकड़ में मंदिर का निर्माण कराया। यहां दद्दी नाम का भगत देवी मां की पूजा करने लगा था।

उस वक्त सीमा विवाद को लेकर यहां सिसौदिया व जादौं घार के बीच खूनी संघर्ष हुआ था। इसमें दोनों ओर से सैकड़ों लोगों की जानें गईं। दद्दी भगत भी मारे गए।

बुजुर्ग बताते हैं कि तभी टकराव को टालने के लिए सिसौदियाओं ने यहां से दूर अकबरपुर में देवी का मंदिर स्थापित कराया। वह वहां पूजा-अर्चना करते हैं और वहीं दंगल भी कराते हैं। वहीं सिसौदिया घार के लोग दद्दी भगत की रक्षा न करने पर देवी मां के सामने रोष भी प्रकट करते हैं।
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