ड्रैकुला, भयानक चेहरा, बड़े और पैने दांतों से आदमी का खून पीने वाला शैतान। इस का नाम लेते ही बदन में डर के मारे सिहरन सी दौड़ जाती है। राहत की बात ये है कि ड्रेकुला असल न होकर एक परिकल्पना है। आयरिश उपन्यासकार ब्रैम स्टोकर ने आज से 115 साल पहले रचा था। स्टोकर ने जिस मेज पर बैठकर कालजयी उपन्यास 'ड्रैकुला' की रचना की थी, वो मेज अगले माह नीलाम होने जा रही है।
कैलीफोर्निया की कंपनी 'प्रोफाइल्स इन हिस्ट्री' के मुताबिक इस मेज को 15 से 16 दिसंबर के बीच नीलाम किया जायेगा। स्टोकर का वर्ष 1912 में निधन हो गया था लेकिन उन्होंने यह मेज अपने मित्र जेएसआर फिलिप्स को दे दी थी। मेज को एक सदी की गुमनामी के दौरान बहुत कुछ झेलना पडा और इसके पायों को छोटा कर दिया गया, यह कई जगह से टूट फूट गयी तथा इसकी दराजें तक गायब हो गयीं।
इस मेज के मौजूदा मालिक ने फर्नीचर डिजायनर मार्क ब्रेजियर जोन्स को न सिर्फ इसे संरक्षित करने का काम सौंपा बल्कि इसे स्टोकर की कल्पनाओं पर आधारित एक कलाकृति में बदल देने का भी आग्रह किया। ब्रेजियर जोन्स ने बताया कि वह मेज पर पडी समय की छाप को तो बचाकर रखना चाहते थे लेकिन उनका लक्षय उस व्यक्ति को भी सलामी देने का था जिसने आधुनिक पॉप संस्कृति को काउंट ड्रेकुला की सौगात दी।
ब्रेजियर जोन्स ने मेज को अदभुत कलाकृति में बदल दिया है जो एक ऐसी भुतहा रात की याद दिलाती है जब काउंट ड्रेकुला अपने शिकार की तलाश में निकलता होगा। हवा में उड़ते चमगादड, रोमानिया के गांवों में भौंकते शिकारी कुत्ते, गुलाब के पौधों की कलियां और कांटे सब कुछ तो इस मेज पर उकेरे गये हैं। साल 1897 में 'ड्रेकुला' के प्रकाशन के साथ ही स्टोकर ने पश्चिम की शहरी संस्कृति को एक नया मिथक दे दिया था।
अगले सौ वर्षों के दौरान साहित्य से लेकर हालीवुड तक वेंपायर संस्कृति खूब फली फूली। इसने जहां साहित्यकारों की एक पूरी पीढी को प्रेरणा दी वहीं फिल्मकारों तथा रंगमंच निर्देशकों को भी प्रेरणा दी। आयरलैंड, ब्रिटेन और रोमानिया में ड्रेकुला उपन्यास के साथ जुडी जगहों पर पर्यटन को भी बढ़ावा मिला।