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दान में भी दिखते हैं देश के विविध रंग

Wed, 23 Jan 2013 07:59 AM IST
महाकुंभ नगर (इलाहाबाद)/ब्यूरो
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भले ही दान के प्रकार चाहे जितने हों, उनका मूल श्रद्धा और सामर्थ्य है। बावजूद इसके संगम की रेती पर आस्था की डुबकी के बाद श्रद्धालुओं की ओर से दिए जाने वाले दान की परंपरा में भी देश की विविधता के रंग दिखते हैं। इसलिए उनकी ओर से दान में वे चीजें ज्यादा शामिल होती हैं, जो उनकी और उनकी माटी की मूल पहचान या वहां की प्रकृति से जुड़ी होती हैं। इसमें अन्न ही नहीं तमाम तरह की वस्तुएं भी शामिल होती हैं।
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छत्तीसगढ़ के तीर्थयात्री चावल तो पंजाब से आने वाले ज्यादातर गेहूं का दान करते हैं। बिहार के तीर्थयात्री अन्नदान में चावल के साथ चूड़ा भी देते हैं तो पंजाब के तीर्थयात्री ज्यादातर तिल से बनी चीजों का दान करते हैं। वरिष्ठ तीर्थपुरोहित पद्मनारायण शोकहा के मुताबिक मध्यप्रदेश के शहडोल की ओर से आने वाले तीर्थयात्री खटरास भी लाते हैं, जिसमें पापड़, बड़ी ही नहीं अचार-मुरब्बा भी होता है।

वरिष्ठ तीर्थ पुरोहित देवेंद्र प्रसाद त्रिपाठी कहते हैं कि हिमाचल के तीर्थयात्रियों के साथ सेब-अंगूर की टोकरी भी होती हैं। वरिष्ठ तीर्थ पुरोहित मधु चकहा के मुताबिक अधिकतर यात्री यहां अन्न में चावल, गेहूं, दाल, सरसों आदि का संकल्प कराते हैं, जिसे वे तीर्थ पुरोहित को अपने घर पहुंचने पर देते हैं। अन्न दान में मूंगफली, नारियल, मेवे और मसाले भी होते हैं।
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वरिष्ठ तीर्थ पुरोहित अजय कुमार पांडेय के मुताबिक मारवाड़ी समाज की सुहागिनों की ओर से सुहाग की पिटारी भी दान में दी जाती है, जिसमें श्रृंगार की सामग्री होती है। वरिष्ठ तीर्थ पुरोहित राजेंद्र पालीवाल के मुताबिक प्रयाग के दान में प्रमुख छत्रदान के तहत छत यानी कमरा, भवन के निर्माण का संकल्प होता है। कुल मिलाकर दान का अंतिम आधार श्रद्धा और सामर्थ्य है, जिसका दायरा असीमित होता है।

संगम के दस प्रमुख दान
दान के चौरासी प्रकार बताए गए हैं लेकिन इसमें से संगम की रेती पर मुख्य रूप से दस दान किए जाते हैं। इसमें गौ, गज, अश्व, पात्र, तिल, सुवर्ण, चांदी, अन्न, भूमि और छत्र हैं। आमतौर पर दिए जाने वाले दान इन्हीं श्रेणियों में शामिल होते हैं।

सबसे अलग होता है गुप्तदान
गुप्तदान सभी प्रकार के दान से अलग होता है। संगम के गुप्तदान की परंपरा पूरी करने वालों में मारवाड़ियों की संख्या ज्यादा होती है। गुप्तदान में तांबे की लुटिया में घी, तिल के बीच सोना-चांदी या कोई भी बहुमूल्य चीज रख दी जाती है। लुटिया को गंगा में स्पर्श करने के बाद दान दे दिया जाता है।
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