उत्तराखंड की पहाड़ियों के बीच एक बर्फीली झील है। सर्दियां आते ही इस झील का पानी जम जाता है लेकिन गर्मी के मौसम में बर्फ पिघलने से झील में पानी आ जाता है। दिखने में खूबसूरत यह झील रूपकुंड के नाम से जाना जाता है।
इस झील तक पहुंचने का मार्ग कठिन होने के कारण पर्वतारोही ही इस झील तक पहुंच पाते हैं। घटना 1942 की है कुछ पर्वतारोही इस झील तक पहुंच गए। यहां आकर जब उन्होंने यहां का नजारा देखा तो उनके होश उड़ गए।
इतने सारे नरकंकाल यहां कैसे आए
खूबसूरत झील के चारों तरफ नरकंकाल बिखरे पड़े थे। इसके बाद से ही यह स्थान रहस्य बना हुआ है और इस बात की खोज चल रही है कि आखिर इतने सारे नरकंकाल यहां कैसे आए, वह कौन से लोग हैं जिनके नरकंकाल यहां बिखरे हुए हैं।
समय-समय पर इस रहस्य से पर्दा हटाने के लिए अलग-अलग तथ्य आते रहे हैं।
क्या यह जापानी सैनिकों का नरकंकाल है?
एक मत है कि द्वितीय विश्व युद्घ के समय जापानी सैनिक इस रास्ते से गुजर रहे थे। बर्फीले पहाड़ियों के बीच उन्हें रास्ता समझ नहीं आया और भटकने लगे। अधिक ठंड की वजह से इन सैनिकों की यहां मौत हो गई। जबकि दूसरा तथ्य कुछ और ही कहता है।
राजा और उनके काफिले की मौत
एक अन्य मत यह कहता है कि, प्राचीन काल में जसधावल नामक राजा संतान प्राप्ति की इच्छा से कुछ लोगों के साथ नंदा देवी की यात्रा पर निकले।
मार्ग में अचानक ओलावृष्टि होने लगी। इससे बर्फीले झील में सभी की समाधि बन गई।
वैज्ञानिक तथ्य यह कहता है
सबसे नवीन तथ्य यह सामने आया है कि, 9वीं शताब्दी में इस क्षेत्र में ओलावृष्टि हुई। उस समय जो भी लोग इस क्षेत्र में थे उन सबकी मौत हो गई। रुपकुंड के आस-पास बिखरे नरकंकाल उन्हीं लोगों के हैं।