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महाकुंभ : दोनों अखाड़ा परिषदें भंग

Tue, 29 Jan 2013 12:41 PM IST
हरिद्वार/इलाहाबाद/अमर उजाला ब्यूरो
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प्रयाग में अखाड़ों को कुंभ से पहले दिए जाने वाले परंपरागत भोज में सोमवार को हुए नाटकीय घटनाक्रम में दोनों अखाड़ा परिषदें भंग हो गईं। श्रीमहंत हरि गिरि के प्रस्ताव पर 13 अखाड़ों ने संयुक्त रूप से निर्णय लिया कि दोनों अखाड़ा परिषदों का वजूद समाप्त किया जाए।
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अखाड़ा परिषद के नए चुनाव कुंभ मेला संपन्न होने के बाद होंगे। माना जा रहा है कि इस घटनाक्रम के बाद सभी विवादों का अंत हो जाएगा। अब श्रीमहंत ज्ञानदास और श्रीमहंत बलवंत सिंह अपनी-अपनी परिषदों के अध्यक्ष नहीं रहे हैं।

हरिद्वार कुंभ के बाद से अखाड़ा परिषद दो फाड़ हो गई थी। ज्ञानदास की अध्यक्षता वाली परिषद में छह और बलवंत सिंह की अध्यक्षता वाली परिषद में सात अखाड़े शामिल थे। तीन वर्षों के अथक प्रयत्नों के बावजूद दोनों परिषदें एक मंच पर नहीं आ पाई। परिणामस्वरूप प्रयाग कुंभ 13 अखाड़ों की मुकामी परिषद करा रही थी। सोमवार को प्रयाग में मेला आईजी आलोक शर्मा द्वारा सभी अखाड़ों को कुंभ से पहले दिया जाने वाला परंपरागत भोज दिया गया। भोज में सभी 13 अखाड़ों के प्रतिनिधि उपस्थित थे।
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इस बीच ज्ञानदास की अध्यक्षता वाली अखाड़ा परिषद के राष्ट्रीय महामंत्री श्रीमहंत हरि गिरि ने प्रस्ताव रखा कि कुंभ के निरापद संपन्न होने के लिए दोनों अखाड़ा परिषदों को भंग किया जाए। उन्होंने पहल करते हुए अपनी अखाड़ा परिषद को भंग कर दिया। इस पर तत्काल प्रतिक्रिया हुई और दूसरी अखाड़ा परिषद के राष्ट्रीय महामंत्री श्रीमहंत शंकरानंद सरस्वती ने भी अपनी अखाड़ा परिषद को भंग करने की घोषणा की।


सौहार्द के माहौल में दोनों परिषदों के पदाधिकारियों ने हरि गिरि, नरेंद्र पुरी, रामानंद पुरी, रविंद्र पुरी आदि संतों के उस संयुक्त प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया, जिसमें कुंभ को निरापद संपन्न कराने की बात कही गई।

बैठक के बाद पत्रकारों से श्रीमहंत हरि गिरि ने कहा कि आज (सोमवार) का दिन ऐतिहासिक है। दो परिषदों के चलते कई काम रुक गए थे। चूंकि परिषद नहीं अपितु अखाड़े महत्वपूर्ण हैं। अत: कुंभ की बागडोर 13 अखाड़े संयुक्त रूप से संभालते रहे हैं। उन्होंने बताया कि अब ज्ञानदास और बलवंत सिंह अध्यक्ष नहीं रह गए हैं।
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ज्ञानदास मुद्दे पर उपजा था विवाद
कमिश्नर की बैठक में निर्मोही के श्रीमहंत राजेंद्र दास की ओर से महंत ज्ञानदास को बतौर अध्यक्ष आमंत्रित किए जाने का प्रस्ताव रखा गया था जिसका निरंजनी के सचिव महंत नरेंद्र गिरि ने विरोध किया था। इसी बात को लेकर दोनों ही के बीच विवाद बढ़ गया था।
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