रंगीली होरी का दिन कृष्ण का था और शाम राधा की। रंगीली की संकरी गली में श्री जी की सखियों के सामने घुटनों के बल बैठे नंदगांव के ग्वाल बाल उछर-उछर उनके लट्ठ खा रहे थे। लट्ठों की पट्ट-पट्ट से जैसे सब धाम अट गए। देवता पुष्प बरसाने लगे।
लठामार की लोक छटा को अंखियन में बसा श्रद्धालु हर्षा रहे थे। गोपियां गा रही थीं, तक तक लठिया मारूं, उछर बचैयो नंदलाल..। कहने को तो युद्ध जैसा लगता था लेकिन ये छड़ी नेह की थी। तभी तो सारे हुरियारे हंस-हंस भाभियों के प्रेम भरे लट्ठ खा रहे थे।
एक थक जाता तो दूसरा ढाल ले लेता और तीन-तीन गोपियां उस पर जुट पड़तीं। ग्वाल हार गए पर गोपियां नहीं। उनकी प्रेम रस भरी लाठियां यूं ही चलती रहीं। हारकर हुरियारे बोले, भाभी तुम जीतीं, हम हारे, पहुंचांगे फगुआ तोहरे द्वारे...
गुरुवार शाम 5:30 बजे जब बरसाने की रंगीली गली लठामार हुई तो जैसे सब कुछ थम गया। अटारियों पर जमा असंख्य भक्तों की नजरें राधा कृष्ण के भाव भरी इस होली पर थी। हृदय में अनुराग की उमड़ घुमड़ चेहरों पर साफ चमकती थी।
इससे पहले 4:30 बजे श्री जी मंदिर से लाल पीले हुए हुरियारे नंदलाल की ध्वजा लिए जैसे ही सीढ़ियों से शोर करते रंगीली में उतरे, आनंद छा गया। सिर पर पाग बांधे, बगलबंदी पहने, हाथ में सजी हुई ढाल लिए नंदलाल के सखा होरी के रसिया गाते भये अपनी भाभियों को टेरने लगे।
कुछ ही देर में लहंगा फरिया पहने हाथों में लंबे लट्ठ लिए गोपियां उनके सामने आ डटीं। फिर शुरू हुई देवर भाभी की हंसी ठिठोली। हुरियारों ने उकसाने को मीठी गारियां तो भाभी भी पीछे न रहीं।
हुरियारे गाने लगे, तोपै आज पिचकरा मारूं... भाभी घूंघट खोल दिखाय दै तेरे नारंगी गाल, भाभी बोली... ऐसी होरी तोहे खिलाऊं, छटी कौ दूध मैं याद दिलाऊं.. मीठी तकरार हुई और फिर हिल मिलकर नाचने लगी। मनुहार के बाद गोपियों के लट्ठ ग्वालों की ढालों पर बरसने लगे। एक घंटे तक ब्रज बाम अपना दम दिखाती रहीं।
दोपहर तीन बजे प्रिया कुंड पहुंचे नंदगांव के हुरियारों का बरसाना के गोस्वामियों ने स्वागत किया। वहां ग्वाल बालों ने अपनी पाग बांध। भांग की मस्ती के बाद हुरियारों की टोली श्री जी मंदिर पहुंची। वहां नंदगांव और बरसाने वालों का समाज गायन हुआ। नंदलाल के सखाओं पर रंगों की ऐसी धार छूटी कि उनका हुलिया ही बदल गया।