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'स्वर्ग तो राधा के धाम में बसता है'

Thu, 21 Mar 2013 06:06 PM IST
बरसाना/ब्यूरो
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जम्मू से आई 13 साल की प्रियंका बरसाने की होली देख गदगद थी। उसने कहा कि स्वर्ग तो राधा के धाम में बसता है। राधा रानी को बहुत मानती हूं।
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कई सालों से तमन्ना थी कि यहां आऊं और इस बार किशोरी जी ने सुन ली। ये होली इस लोक की नहीं है। ये भगवान की होली है जिसे देखना बहुत बड़ी खुशनसीबी है।

गुलाल में रंगी लुधियाना की वीणा पिछले 15 सालों से यहां आ रही हैं। उन्होंने बताया कि ऐसा आनंद मुझे कहीं नहीं मिला। इसलिए हर साल श्री जी की गोद में आ जाती हूं।

हिसार की गीता फाग में प्रफुल्लित थीं। अपने भाव की अभिव्यक्ति के नाम पर खामोश हो गईं। बोलीं, इस आनंद को बताया नहीं जा सकता, सिर्फ महसूस किया जा सकता है।
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दिल्ली के डॉ. अजय शर्मा हर साल यहां आते हैं। उनका कहना था कि राधा रानी खुद ही खींच लाती हैं। यहां ऐसी कशिश है कि एक बार कोई आ जाए तो यहीं का हो जाए।

गुलाल लगाकर मिले गले
प्रिया प्रीतम की प्रेम भरी होली में तर हुए रसिकों के चेहरे खुशी से चमके थे। उनका भी हृदय प्रेम से भर गया और अजनबियों को गुलाल लगाकर गले लगा लिया। बरसाने के फाग में अनेक संस्कृतियों का मिलन हुआ। पहनावा, परंपरा, बोली सबकी अलग अलग थी पर भाव एक था।

पुलिस ने डाला रंग में भंग
गुड वर्क के चक्कर में पुलिस ने रंग में भंग डाल दिया। शाम 5 बजे तक मंदिर को अनुशासित रखने वाला पुलिस दल अचानक से आक्रामक हो गया। मंदिर के बाहर प्रांगण में जमी संगीत मंडली के स्पीकर तोड़ दिए। एसओ बरसाना ने सिर्फ यही नहीं किया बल्कि वहां बैठे कई श्रद्धालुओं पर डंडा चलाया। इससे भक्तों में रोष था। उन्होंने कहा कि हम साल में एक बार यहां होली के रंग में रंगने आते हैं पर पुलिस ने मस्ती से भरे माहौल को खराब कर दिया।

इस घटना से पुलिस ने अपने अच्छे काम को खराब कर दिया। इस बार पुलिस की वजह से मंदिर में कोई अभद्रता नहीं हो पाई। सबको छतों से उतार दिया गया। पुलिस की चौकसी के चलते लड़कियों ने सुरक्षित महसूस किया लेकिन अंत में पुलिस ने अपना असली रंग दिखा ही दिया।

स्पीकर तो तोड़ दिया पर नहीं रोक पाए उल्लास
तुम स्पीकर तो तोड़ सकते हैं पर इन रसिकों का उल्लास कैसे रोकोगे। दस मिनट हुए। प्रांगण में ढोलक आई और रसिया गूंजा, आज बिरज में होरी रे रसिया... इस पर कहां कदम रुकने वाले थे। हाथों में हाथ डाले रसिक झूमने लगे। उसके कुछ ही कदम दूरी पर दूसरी मंडली का रंग जमा था।
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ब्रज भाषा की मिठास में फाग के गीतों ने ऐसा रस बरसाया कि हर कोई नाचने लगा। मैं होरी खेलऊंगी सांवरिया सों डट कै... पर दे दे ताली ठुमक रहे थे। कोई झूम रहा, कोई घूम रहा, अपने ही रंग में रंग रहा, सबके सिर फाग चढ़ रहा.. ये नजारा कुछ ऐसा ही था।

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