हाल ही में वैश्विक क्रेडिट रेटिंग एजेंसी फिच ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि भारत सरकार ने बैंक ऑफ बड़ौदा, विजया बैंक और देना बैंक के विलय का जो फैसला किया है, उससे भारत बैंकिंग क्षेत्र में बड़े सुधार की राह पर आगे बढ़ेगा। सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के साथ-साथ क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों के विलय की दिशा में तेजी से आगे बढऩे की बात कही है। इससे सरकारी बैंकों की संख्या घटकर 8-10 तथा क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की संख्या 56 से घटकर 36 हो सकती है। पिछले दिनों वैश्विक रेटिंग एजेंसी मूडीज ने भी अपनी रिपोर्ट में कहा कि भारत में सरकार के द्वारा छोटे-छोटे बैंकों के एकीकरण से बड़े और मजबूत बैंक बनाया जाना देश के बैंकिंग परिदृश्य की जरूरत है।
बैंक ऑफ बड़ौदा, विजया बैंक और देना बैंक के विलय के बाद यह एसबीआई तथा एचडीएफसी बैंक के बाद देश का तीसरा बड़ा बैंक होगा। विलय की प्रक्रिया मार्च, 2019 तक पूरी कर ली जाएगी और इस नए आकार वाले बड़े बैंक को बेहतर तरीके से पर्याप्त पूंजी दी जाएगी, ताकि वह निजी क्षेत्र के बैंकों को टक्कर दे सके। उल्लेखनीय है कि 17 जुलाई, 2018 को सरकार ने पांच सरकारी बैंकों पंजाब नेशनल बैंक, कॉरपोरेशन बैंक, इंडियन ओवरसीज बैंक, आंध्रा बैंक तथा इलाहाबाद बैंक के पूंजीकरण के तहत 11,337 करोड़ रुपये का आर्थिक पैकेज घोषित किया है। इसके पहले 24 अक्तूबर, 2017 के तहत फंसे कर्ज की समस्या से जूझ रहे सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में अगले दो साल में 2.11 लाख करोड़ रुपये का आर्थिक पैकेज दिया जाना सुनिश्चित किया गया था। यद्यपि बैंक पूंजी बाजार भी जा सकते हैं, लेकिन सरकारी बैंकों के शेयर मूल्य इतने कम हैं कि सरकारी बैंक शेयर बाजार से भी अपेक्षित पूंजी नहीं जुटा पाएंगे। सरकार सरकारी बैंकों का निजीकरण करते हुए उन्हें निजी हाथों में बेच भी सकती है, लेकिन फिलहाल देश में सरकारी बैंकों को खरीदने की संभावना रखने वाले भरोसेमंद व्यक्ति या संगठन दिखाई नहीं दे रहे हैं। इन सबके अलावा सरकारी बैंकों को विदेशियों को भी बेचा जा सकता है, लेकिन इस समय यह देश हित एवं राजनीतिक दृष्टि से सही नहीं होगा। इस तरह ऐसा कोई उपाय नहीं है, जो एक झटके में बैंकों की हालात सुधार दे और अर्थव्यवस्था की विभिन्न दिक्कतें दूर कर दे। चूंकि सरकार किसी सरकारी बैंक को विफल नहीं होने देना चाहती है, इसलिए वह बैंकों को जरूरी पूंजी मुहैया करा रही है। नीति आयोग का कहना है कि बैंकों को पूंजी मिलने से कर्ज देना आसान होगा। कर्ज देने की रफ्तार बढ़ने की स्थिति में निजी निवेश में तेजी आएगी।
सरकारी बैंक एक ओर मुद्रा लोन, एजुकेशन लोन और किसान क्रेडिट कार्ड के जरिये बड़े पैमाने पर कर्ज बांट रहे हैं। वहीं दूसरी ओर बैंकरों को लगातार पुराने कर्ज की वसूली भी करनी पड़ रही है। परिणामस्वरूप बैंक अधिकारी-कर्मचारी अपने मूल काम यानी कोर बैंकिंग के लिए बहुत कम समय दे पा रहे हैं। चूंकि बीमा या सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का लाभ लेने के लिए बैंक खाता जरूरी है। ऐसे में ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकिंग सुविधाओं की भारी कमी है। विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार 31 मार्च, 2018 तक जनधन योजना के तहत 31.44 करोड़ खाते हैं। 2014 से 2017 के बीच दुनिया में 51 करोड़ खाते खुले। जिसमें से 26 करोड़ खाते केवल भारत में जन-धन योजना के अंतर्गत हैं। भारत में इस अवधि में 26 हजार नई बैंक शाखाएं भी खुली हैं। ऐसे में भारत की नई बैंकिंग जिम्मेदारी बैंकों के निजीकरण से संभव नहीं है। ऐसी जिम्मेदारी मजबूत सरकारी बैंक के द्वारा ही निभाई जा सकती है।