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जरूरत पड़ने पर जद (यू) बना सकता है पीके को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार

Tue, 18 Sep 2018 04:47 AM IST
विनोद अग्निहोत्री, नई दिल्ली
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चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर यानी पीके ने सक्रिय राजनीति का रास्ता अपनाते हुए सिर्फ जनता दल(यू) का दामन ही नहीं थामा है, आने वाले दिनों में वह नीतीश कुमार के बाद जद(यू) के सबसे शक्तिशाली नेता होंगे और मुमकिन है जब भी नीतीश कुमार केंद्र की राजनीति में आने का फैसला करें तो बिहार में जद(यू) की कमान भी वह संभाल सकते हैं और मुख्यमंत्री का चेहरा भी बन सकते हैं। 
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बिहार के मुख्यमंत्री और जद(यू) के अध्यक्ष नीतीश कुमार से पीके की निकटता जगजाहिर है।इसलिए पीके का जद(यू) में जाना चौंकाता नहीं है, लेकिन बड़ी बात यह है कि नीतीश कुमार ने पीके को पार्टी में शामिल करते ही सारे वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी में उन्हें पार्टी का युवा भविष्य बताते हुए एक तरह से अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। अपनी इस घोषणा के जरिए नीतीश कुमार प्रशांत किशोर के जरिए बिहार की राजनीति में एक बड़ा दांव चलने जा रहे हैं। वह अपने अति पिछड़े पसमांदा मुसलमान महादलित जनाधार के साथ राज्य के पांच से छह फीसदी ब्राह्णणों और 14 फीसदी सवर्ण जनाधार में भी सेंध लगाने की रणनीति पर काम कर रहे हैं।

क्या कहता है प्रशांत के प्रति नीतीश का विश्वास

पीके के प्रति एनके का यह विश्वास और प्रेम वंशवाद, परिवारवाद और जातिवादी राजनीति के मौजूदा परिदृश्य में एक अचंभित करने वाले कदम के साथ साथ बेहद साहस भरी घोषणा है, जिससे जद(यू) के तमाम दिग्गज नेताओं की नींद भी हराम होने की पूरी संभावना है। इन दिनों जद(यू) में नीतीश कुमार के सबसे भरोसेमंद नेता सांसद और पूर्व आईएएस अधिकारी आरसीपी सिंह हैं, जो जब नीतीश के रेल मंत्री होते हुए उनके पीएस हुआ करते थे। 

महागठबंधन से अलग होने और शरद यादव जैसे वरिष्ठ नेता के पार्टी से बाहर हो जाने के बाद जद(यू) पूरी तरह नीतीश कुमार पर ही निर्भर है और उनके बाद दूसरी पांत के नेताओं में यूं तो वशिष्ठ नारायण सिंह, केसी त्यागी, जैसे और नाम भी हैं, लेकिन ये नेता उम्र में नीतीश कुमार से भी ज्यादा उम्रदराज हैं। जबकि पार्टी के युवा नेताओं में कोई एसा नाम नहीं है जिसे नीतीश कुमार अपने बाद पार्टी की पूरी जिम्मेदारी सौंप सकें। एसे में दो ही नाम हैं पीके और आरसीपी सिंह। आरसीपी नीतीश कुमार के सजातीय हैं और नीतीश अपने ऊपर जातिवादी होने का कोई ठप्पा नहीं लगने देना चाहते। जबकि प्रशांत किशोर ब्राह्णण हैं और जद(यू) में कोई प्रमुख ब्राह्णण नेता नहीं है। 

नीतीश पीके को आगे करके अपने अति पिछड़े जनाधार के साथ बिहार के 14 फीसदी सवर्ण जनाधार में सेंध लगाकर अपना एक नया जनाधार भी तैयार करने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। ताकि अगर भविष्य में कभी भाजपा से अलग होने की नौबत आए तो जद(यू) अपने अति पिछड़े, अल्पसंख्यक और सवर्ण जनाधार के साथ राजद और  भाजपा दोनों की चुनौती का मुकाबला कर सके। इसलिए आरसीपी की अपेक्षा पीके की उपयोगिता नीतीश कुमार के लिए हर तरह से ज्यादा अहम है। पीके की रणनीतिक कुशलता और राष्ट्रीय स्तर पर उनकी पहचान भी जद(यू) और नीतीश के लिए फायदेमंद हो सकती है। 

प्रशांत किशोर के फैसले की कुछ ऐसी है कहानी

प्रशांत किशोर के इस फैसले के पीछे की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है। 2014 में नरेंद्र मोदी के चुनाव प्रचार अभियान की कमान संभालकर मशहूर हुए पीके ने जब 2015 में बिहार में नीतीश कुमार के प्रचार अभियान का जिम्मा संभाला तो ज्यादातर लोगों को लगा था कि प्रशांत किशोर ने कुल्हाड़ी पर ही पैर रख दिया है। दिल्ली में जद(यू) नेता केसी त्यागी के घर पर तब चुनिंदा पत्रकारों के साथ एक अनौपचारिक मुलाकात में पीके ने अपने फैसले की एक बड़ी वजह बताते हुए कहा था कि वह यह देखना चाहते हैं कि 2014 में वह आंधी के साथ थे या उन्होंने आंधी पैदा की थी। तब वहां मौजूद कुछ पत्रकारों ने इसे पीके का बडबोलापन माना था। लेकिन नीतीश लालू कांग्रेस महागठबंधन से लेकर पटना और पूरे बिहार में जिस तरह पीके ने चुनाव प्रचार अभियान का संचालन किया उससे भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की रणनीति और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करिश्मे को जबर्दस्त धक्का लगा और महागठबंधन की तूफानी जीत हुई। 

बिहार में पीके ने अपनी बात को साबित कर दिखाया और उसके बाद राजनीति की मंडी में पीके की मांग बेहद तेज हो गई। कांग्रेस में राहुल गांधी ने पीके को उत्तर प्रदेश, पंजाब और उत्तराखंड विधानसभा चुनावों के प्रचार अभियान और रणनीति की जिम्मेदारी दे दी। कांग्रेस के प्रथम परिवार ने पीके पर इतना ज्यादा भरोसा दिखाया कि पार्टी के कई दिग्गजों की नींद हराम हो गई । पीके ने भी 27 साल उत्तर प्रदेश बेहाल और शीला दीक्षित को मुख्यमंत्री उम्मींदवार नामित करवाकर ब्राह्मण सवर्ण कार्ड खेला और राहुल गांधी के लखनऊ, सोनिया गांधी के बनारस और राहुल की किसान यात्रा, कर्ज माफी कार्ड की सफलता ने उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को जिंदा कर दिया। लेकिन पाकिस्तान पर सर्जिकल स्ट्राईक से घबराए कांग्रेस नेतृत्व को पार्टी के दिग्गज नेताओं ने एसा समझाया और फिर सब ने मिलकर उत्तर प्रदेश में एसा चक्रव्यूह तैयार किया जिसमें कांग्रेस तो निपटी ही साथ साथ पीके का करिश्मा भी धूमिल हो गया।

हालांकि पीके के प्रचार अभियान ने पंजाब में कांग्रेस को भारी जीत दिलाई और आम आदमी पार्टी के गुब्बारे की हवा भी निकाली, लेकिन उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की हार ने पीके की पंजाब की सफलता को दबा दिया। इससे लड़खड़ाए पीके ने दक्षिण में आंध्र प्रदेश में जगन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस के चुनाव अभियान की कमान संभाली। लेकिन उत्तर भारत की मुख्यधारा की राजनीति के आदी पीके को दक्षिण की राजनीति का मैदान बहुत रास नहीं आया। 
 
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भाजपा से जुड़े लेकिन नीतीश से बनाए रखे रिश्ते

बिहार चुनाव के बाद भी पीके के नीतीश कुमार से रिश्ता और संपर्क बना रहा। यह अलग बात है कि जब नीतीश ने महागठबंधन छोड़कर दोबारा भाजपा से दोस्ती की तो पीके उस फैसले से सहमत नहीं थे, पर उन्होंने सार्वजनिक रूप से कभी अपनी असहमति जाहिर नहीं की। उन्होंने नीतीश से अपने रिश्ते बनाए रखे। इस बीच उनके तार भाजपा और प्रधानमंत्री मोदी से दोबारा जुड़ने की खबरें भी आईं । लेकिन पीके ने न उनकी पुष्टि की न खंडन। बकौल पीके बिहार चुनाव जीतने के बाद भी नीतीश कुमार ने उन्हें मंत्री बनने का प्रस्ताव दिया था, लेकिन तब पीके ने शालीनता से मना कर दिया था। फिर भी उन्हें राज्य मंत्री का दर्जा दे दिया गया था, जिसे बाद में उन्होंने खुद वापस कर दिया। उसके बाद से ही नीतीश को प्रशांत किशोर पर बेहद भरोसा हो गया। इसके बाद जब जगन से पीके का मोह भंग हुआ तो नीतीश ने उन्हें सीधे राजनीति में आने और जद(यू) में शामिल होने का न्यौता दिया जिसे पीके ने मंजूर कर लिया।
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